पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर तुष्टीकरण और वित्तीय प्राथमिकताओं को लेकर घमासान तेज हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा साल 2012 में शुरू की गई मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद चर्चित ‘इमाम भत्ता योजना’ को विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के हस्तक्षेप और कड़े रुख के बाद बंद कर दिया गया है। इस योजना के तहत राज्य के करीब 30,000 इमामों को हर महीने 3,000 रुपये (यानी सालाना 36,000 रुपये) का मानदेय दिया जा रहा था, जिससे सरकारी खजाने पर हर साल 110 करोड़ से 150 करोड़ रुपये के बीच का वित्तीय बोझ आ रहा था।
विस्तृत विवरण : 2012 में वोट बैंक और तुष्टीकरण के लगे थे आरोप
उल्लेखनीय है कि साल 2011 में सत्ता में आने के ठीक बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2012 में इस योजना की घोषणा की थी। तब से लेकर अब तक यह योजना हमेशा विवादों के घेरे में रही। विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने इसे ‘वोट बैंक की राजनीति’ और ‘एकतरफा तुष्टीकरण’ करार दिया था। मामला अदालत तक भी पहुंचा था, जहां सरकारी कोष से किसी एक धर्म विशेष के धार्मिक गुरुओं को वेतन या भत्ता देने की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए थे।
सुवेंदु अधिकारी का कड़ा प्रहार और कार्रवाई
इस योजना को बंद कराने में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने इसे राज्य के करदाताओं के पैसों का दुरुपयोग और असंवैधानिक बताते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोला था। आधिकारिक स्तर पर कानूनी और प्रशासनिक आपत्तियों के बाद आखिरकार इस भत्ते पर रोक लगा दी गई है। सुवेंदु अधिकारी का तर्क था कि सरकार को सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना चाहिए और जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा किसी धार्मिक तुष्टीकरण के बजाय राज्य के बुनियादी विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए।
योजना का पूरा गणित और इतिहास
शुरुआत: साल 2012 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा।
लाभार्थी: पश्चिम बंगाल के लगभग 30,000 इमाम।
मासिक भत्ता: 3,000 रुपये प्रति माह (सालाना 36,000 रुपये)।
सालाना बजटीय बोझ: राज्य सरकार के खजाने से 110 करोड़ से 150 करोड़ रुपये का वार्षिक व्यय।
ताजा स्थिति: सुवेंदु अधिकारी के कड़े विरोध और कानूनी/प्रशासनिक आपत्तियों के बाद योजना पूरी तरह बंद।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस फैसले के बाद बंगाल की सियासत गरमा गई है। जहां भाजपा खेमे ने इसे कानून और संविधान की जीत बताया है, वहीं सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सूत्रों का कहना है कि यह कदम अल्पसंख्यकों के कल्याण और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को रोकने की एक राजनीतिक साजिश है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर और गहरा असर डाल सकता है।

