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‘थोक’ में पाला बदल और लोकतंत्र की मर्यादा! जब रक्षक ही ‘बिना पेंदे के लोटे’ बन जाएं…

AAP के 7 सांसदों का भाजपा में विलय; ‘आया राम-गया राम’ से लेकर ‘थोक दलबदल’ तक, राजनीति के गिरते स्तर पर एक विशेष रिपोर्ट।

अहमदाबाद/दिल्ली : भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 24 अप्रैल 2026 की तारीख एक और ‘सियासी दलबदल’ के लिए दर्ज हो गई है। राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 सांसदों ने एक साथ भाजपा का दामन थाम लिया। संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के 2/3 बहुमत के प्रावधान का उपयोग कर इन सांसदों ने अपनी सदस्यता तो बचा ली, लेकिन जनता की नजरों में नैतिकता का क्या? इसे ‘विभाजन’ कहें या ‘थोक खरीदारी’, यह आज का सबसे बड़ा सवाल है।

इतिहास के काले पन्ने: गुजरात से गोवा तक

पाtargetला बदलने के मामले में गुजरात का इतिहास भी दागदार रहा है।

खजुराहो कांड (1995): शंकर सिंह वाघेला ने भाजपा सरकार के खिलाफ बगावत की और 47 विधायकों को लेकर खजुराहो चले गए थे। नतीजा? केशुभाई पटेल को कुर्सी गंवानी पड़ी।
मप्र-महाराष्ट्र: 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया (22 विधायक) और 2022 में एकनाथ शिंदे (40 विधायक) ने जिस तरह तख्तापलट किया, उसने साबित कर दिया कि विचारधारा से बड़ा ‘अवसर’ होता है।

क्यों खरीदे जा रहे हैं ‘बिना पेंदे के लोटे’?

सवाल सीधा है—अगर कोई नेता विश्व स्तर पर सबसे लोकप्रिय है, अगर पार्टी के पास प्रचंड बहुमत है, तो फिर विपक्षी दलों के नेताओं को ‘टेके के भाव’ पर खरीदने की जरूरत क्यों पड़ती है?

जानकारों का मानना है कि यह ‘विपक्ष मुक्त भारत’ बनाने की रणनीति का हिस्सा है। विधायकों या सांसदों की इस खरीद-फरोख्त में चेक नहीं, बल्कि ‘ब्लैक मनी’ और ‘केंद्रीय एजेंसियों’ का डर एक प्रमुख भूमिका निभाता है।

गिरगिट भी शरमा जाए: भाषा का बदलता रंग

राजनीति में बेशर्मी की कोई सीमा नहीं होती। ‘बिना पेंदे के लोटे’ की खासियत यह है कि वे ‘ऑल वेदर प्रूफ’ होते हैं।
जो नेता कल तक मोदी जी को ‘हिटलर’ या ‘भ्रष्टाचारी’ कहते थे, पाला बदलते ही उन्हें ‘यशस्वी प्रधानमंत्री’ और ‘मसीहा’ नजर आने लगते हैं।
जिस भाजपा को राघव चड्ढा ने कभी ‘गुंडों की पार्टी’ कहा था, आज वही उनके साथियों को ‘देवदूतों की टोली’ लगने लगी है।

कानूनी पेच: दलबदल या विलय?

1985 में लाया गया ‘एंटी-डिफेक्शन लॉ’ व्यक्तिगत स्वार्थ को रोकने के लिए था। लेकिन राजनीतिज्ञों ने इसका तोड़ निकाल लिया—’थोक दलबदल’। अगर 2/3 सदस्य साथ जाते हैं, तो उसे वैधानिक ‘विलय’ मान लिया जाता है। संविधान ने यह प्रावधान इसलिए रखा था ताकि हाईकमान निरंकुश न बने, लेकिन आज सत्तापक्ष इसका इस्तेमाल विपक्ष को खत्म करने के लिए कर रहा है।

कटाक्ष : आया राम – गया राम

1967 में हरियाणा के ‘गया लाल’ ने 15 दिन में 3 बार पार्टी बदली थी। आज के आधुनिक ‘गया लाल’ बस इतना ध्यान रखते हैं कि वे अकेले न जाएं, बल्कि पूरे ‘कुनबे’ को साथ ले जाएं ताकि कानून का डंडा न चले।

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