प्रोजेक्ट ऑफिसर नरेश पटेल और जे.सी. पटेल की जोड़ी ने डायलिसिस केंद्रों को लूटपाट के अड्डे बनाए: “पटेल लॉबी” द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की
उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की पुरजोर मांग!
पत्रकार रिपोर्ट – महानगर मेट्रो न्यूज़ गांधीनगर/अहमदाबाद, : गुजरात सरकार द्वारा गरीब और किडनी के गंभीर मरीजों के इलाज के लिए शुरू किए गए महत्वपूर्ण “ए-वन डायलिसिस प्रोग्राम” में प्रशासनिक तंत्र के भ्रष्ट अधिकारियों ने जमकर लूटपाट मचाई है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानसेरिया के विभाग के तहत चल रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किए जाने के चौंकाने वाले और गंभीर सबूत सामने आए हैं। प्रोजेक्ट ऑफिसर नरेश पटेल और प्रशासनिक अधिकारी जे.सी. पटेल की जोड़ी द्वारा चलाई जा रही मनमानी और एक खास “लॉबी” के भ्रष्ट खेल के कारण सरकारी तिजोरी को भारी चूना लग रहा है।
“महानगर मेट्रो” समाचार पत्र के हाथ लगी पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस डायलिसिस प्रोग्राम में ओवर-बिलिंग, अवैध भर्तियों, फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों के आधार पर सैलरी स्लैब में गड़बड़ी और डॉक्टरों को बिना जरूरत के सरकारी धन की रेवड़ियाँ बांटने जैसे गंभीर घोटालों का पर्दाफाश हुआ है।
घोटाले के मुख्य और घातक बिंदु: कागज पर चल रहा भ्रष्टाचार का खेल
- मंजूर संख्या से कहीं अधिक धड़ल्ले से भर्ती (ओवर-स्टाफिंग का घोटाला)
टेंडर के नियमों के अनुसार सीनियर एचडी टेक्नीशियन (Senior HD Technician) के केवल 10 पद ही निर्धारित किए गए हैं। नियम के मुताबिक किसी भी प्रोजेक्ट में मंजूर संख्या में अधिकतम 25% तक की ही वृद्धि की जा सकती है, यानी किसी भी स्थिति में 13 से अधिक पद नहीं भरे जा सकते। परंतु, प्रोजेक्ट के भ्रष्ट प्रबंधकों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 30 या उससे अधिक कर्मचारियों की अवैध भर्ती/तैनाती कर डाली है! इतनी बड़ी संख्या में अतिरिक्त भर्ती किस आधिकारिक नियम या मंजूरी के आधार पर की गई? यह एक बहुत बड़ा सवाल है। इसके साथ ही जूनियर एचडी टेक्नीशियन और असिस्टेंट टेक्नीशियन के पदों में भी बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बरते जाने की आशंका है।
- फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और ‘पटेल लॉबी’ का काला कारोबार
टेंडर के नियमों के अनुसार टेक्नीशियनों के लिए वेतन के तीन स्लैब तय किए गए हैं:
10 साल के अनुभव वाले को 40,000 रुपये,
7 से 10 साल के अनुभव वाले को 32,000 रुपये, और
बाकी अन्य के लिए 24,000 रुपये वेतन।
परंतु, प्रोजेक्ट ऑफिसर नरेश पटेल द्वारा मनमाने तरीके से कहीं से भी और किसी भी तरह के प्रमाण पत्र स्वीकार करके टेक्नीशियनों को ऊंचे वेतन वाले स्लैब में सेट कर दिया गया है! उदाहरण के तौर पर, बहरामपुरा म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के डायलिसिस विभाग में काम करने वाली टेक्नीशियन भूमि पटेल ने अधिक अनुभव दिखाकर सीधे रु. 32,000 के स्लैब में अपनी सेटिंग कर ली। हकीकत यह है कि वह दो साल तक विदेश में रही थी, जिसका उल्लेख प्रमाण पत्र में छुपाया गया था। इस बात को प्रोजेक्ट ऑफिसर नरेश पटेल और प्रशासनिक अधिकारी जे.सी. पटेल अच्छी तरह जानते थे, फिर भी 24,000 वाले स्लैब के योग्य होने के बावजूद उसे सीधे 32,000 के स्लैब में पदस्थ कर दिया गया!
यह साफ तौर पर साबित करता है कि पूरे प्रोजेक्ट में केवल और केवल “पटेल लॉबी” चलाई जा रही है। टेक्नीशियनों से सैटिंग करके पैसों की उगाही करना और एजेंसियों से हर महीने भारी कमीशन वसूलना ही इन अधिकारियों का मुख्य उद्देश्य बन चुका है।
- डॉक्टरों को गैर-जरूरी विजिट के नाम पर सरकारी धन की लूट (डॉ. उषा पटेल की बेलगाम लिप्तता)
जहां मरीजों की संख्या कम है, ऐसे छोटे डायलिसिस केंद्रों पर भी नियमों के विरुद्ध जाकर हफ्ते में 3-3 बार डॉक्टरों की गैर-जरूरी विजिट तय कर दी गई हैं। विशेष रूप से नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. उषा पटेल पिछले दो सालों से प्रोजेक्ट ऑफिसर नरेश पटेल और जे.सी. पटेल के साथ मिलकर सरकारी खजाने की बेहिसाब लूट मचा रही हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या वाकई इतनी विजिट्स होती थीं?
क्या डॉक्टर द्वारा दर्शाए गए घंटे वास्तव में मरीजों की सेवा के लिए दिए गए थे?
डॉक्टरों की नियुक्ति से लेकर उनकी विजिट और बिल भुगतान तक में केवल और केवल एक खास जाति और अपने चहेतों को ही अंधाधुंध आर्थिक फायदा पहुंचाया गया है। यदि सभी सेंटरों के OPD/Visit Register, Biometric/GPS रिकॉर्ड और मरीजों की उपस्थिति की निष्पक्ष जांच की जाए, तो एक बहुत बड़ा घोटाला सामने आ सकता है।
“महानगर मेट्रो” समाचार पत्र की कड़ी मांग
स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानसेरिया के विभाग के तहत चल रहे इस संवेदनशील प्रोजेक्ट में हुए इस घृणित भ्रष्टाचार को लेकर “महानगर मेट्रो” स्पष्ट मांग करता है कि:
- सभी कर्मचारियों के अनुभव प्रमाण पत्र की सत्यता की गहराई से जांच हो और जिन संस्थानों से ये सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं, उनसे लिखित में इसका सत्यापन कराया जाए।
- इस पूरे घोटाले की जांच आम सरकारी अधिकारियों से कराने के बजाय, इस प्रोजेक्ट या IKDRC से कभी भी जुड़े न रहे किसी निष्पक्ष और वरिष्ठ सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय न्यायिक जांच समिति गठित की जाए और दोषी अधिकारियों (नरेश पटेल, जे.सी. पटेल और डॉ. उषा पटेल) के खिलाफ सख्त से सख्त आपराधिक (फौजदारी) कार्रवाई की जाए!
यदि आने वाले समय में इन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती है, तो “महानगर मेट्रो” इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाने से भी पीछे नहीं हटेगा!

