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गुजरात में शिक्षा का बंटाधार! 7 आयुर्वेदिक कॉलेजों की मान्यता रद्द होने से मचा हड़कंप; सरकार की नीतियों पर उठे गंभीर सवाल

महानगर मेट्रो न्यूज रिपोर्टर : गांधीनगर/अहमदाबाद: गुजरात में तथाकथित विकास और ‘गतिशील मॉडल’ के पीछे शिक्षा क्षेत्र में पनप रहे फर्जीवाड़े का एक और बड़ा मामला सामने आया है। राज्य के 7 आयुर्वेदिक कॉलेजों में नियमों की धज्जियां उड़ाकर चलाई जा रही गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए नियामक संस्थाओं द्वारा उनकी मान्यता रद्द कर दी गई है। इस कड़े फैसले से सैकड़ों मासूम छात्रों और उनके अभिभावकों का भविष्य अंधकार में लटक गया है, जिससे पूरे राज्य के शैक्षणिक गलियारों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

क्या यही है ‘गतिशील गुजरात’ का कड़वा सच?

शिक्षा विभाग और शासन की नाक के नीचे निजी शिक्षण संस्थानों में खुलेआम मनमानी चल रही है। राज्य सरकार शिक्षा के क्षेत्र में बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गुजरात में शिक्षा का बाजारीकरण हो चुका है। आयुर्वेदिक कॉलेजों में योग्य फैकल्टी की भारी कमी, आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर और संबद्ध अस्पतालों में सुविधाओं का न होना जैसी खामियों के बावजूद सालों तक इन संस्थानों को चलाने देना शिक्षा विभाग की निगरानी प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है।

शिक्षा मंत्री और प्रशासन से चुभते सवाल:

छात्रों के भविष्य का जिम्मेदार कौन?: लाखों रुपये की मोटी फीस भरकर आयुर्वेद की पढ़ाई करने वाले छात्रों का क्या कसूर है? मान्यता रद्द होने के बाद उनके कीमती सालों और पैसों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

प्रशासन की लापरवाही कब तक?: राज्य के शिक्षा मंत्री और विभागीय अधिकारियों को इन गड़बड़ियों की भनक पहले क्यों नहीं लगी? क्या इतने समय तक इन कॉलेजों की अनियमितताओं पर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं?

भ्रष्ट संचालकों पर कड़ी कार्रवाई कब?: महज मान्यता रद्द कर देने भर से मामला खत्म नहीं होता। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले कॉलेज संचालकों और फर्जी मंजूरियां देने वाले अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर जेल भेजने की कार्रवाई कब होगी?

अभिभावकों और जनता में भारी रोष

शिक्षा के नाम पर चल रही इन दुकानों और सरकारी उदासीनता के कारण आम जनता में भारी गुस्सा है। लोगों का कहना है कि राज्य में शिक्षा का स्तर सुधारने के बजाय व्यवस्था में ढील दी जा रही है। अगर शासन और शिक्षा विभाग ने इस तरह के मामलों में सख्त और स्थाई कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। अभिभावकों ने मांग की है कि सरकार सभी प्राइवेट कॉलेजों का निष्पक्ष ऑडिट कराए और प्रभावित छात्रों को तुरंत अन्य मान्यता प्राप्त कॉलेजों में समायोजित करे।

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