गुजरात के प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में प्रशासनिक अनियमितताएं, वित्तीय घोटाले और खुलेआम भाई-भतीजावाद का पर्दाफाश; रजनीकांत मकवाणा के सनसनीखेज खुलासे।
अहमदाबाद : गुजरात के अत्यंत संवेदनशील और प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों IKDRC (इंसटीट्यूट ऑफ किडनी डिसीज एंड रिसर्च सेंटर) और GUTS (गुजरात यूनिवर्सिटी ऑफ ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज) में इस वक्त इलाज नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग, वित्तीय घोटालों और खुलेआम पनपते भाई-भतीजावाद का खेल चल रहा है। रजनीकांत मकवाणा द्वारा जारी किए गए सबूतों ने इन संस्थानों के प्रशासनिक खोखलेपन को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
आइए समझते हैं कि कैसे इन संस्थानों में नियमों और कानूनों को ताक पर रखकर सत्ता का दुरुपयोग किया जा रहा है:
- आरोपी खुद बना जज: कुदरती न्याय के सिद्धांतों की धज्जियां
GUTS के इंचार्ज कुलपति डॉ. प्रांजल मोदी के खिलाफ गंभीर अनियमितताओं की शिकायत दर्ज कराई गई थी। इस शिकायत की जांच के लिए इसे IKDRC के निदेशक (डायरेक्टर) के पास भेजा गया। लेकिन असली खेल यहीं हुआ—डॉ. प्रांजल मोदी खुद ही IKDRC के निदेशक हैं! उन्होंने अपने ही खिलाफ आई शिकायत पर खुद हस्ताक्षर करके केस बंद (Case Closed) कर दिया। “आरोपी खुद अपना जज बने”—कानून का ऐसा मजाक बनाकर कुदरती न्याय के सिद्धांतों को तार-तार कर दिया गया।
- पिछले 6 साल से गैर-कानूनी ‘इंचार्ज’ शासन
‘द गुजरात यूनिवर्सिटी ऑफ ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज (अमेंडमेंट) एक्ट, 2024’ के अनुसार, कुलपति की नियुक्ति 5 साल के निश्चित अनुबंध (कांट्रैक्ट) के आधार पर सिर्फ सार्वजनिक विज्ञापन और सर्च कमेटी की सिफारिश से ही हो सकती है। कानून में स्थायी “इंचार्ज” पद का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद, बिना किसी विज्ञापन या सर्च कमेटी के, डॉ. प्रांजल मोदी अक्टूबर 2020 से (पिछले 6 सालों से) गैर-कानूनी तरीके से इस पद पर काबिज हैं।
- पति ‘कुलपति’ और पत्नी ‘डीन’: भाई-भतीजावाद की पराकाष्ठा
डॉ. प्रांजल मोदी खुद बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन हैं। उन्होंने संस्थान के अत्यंत वरिष्ठ और योग्य प्रोफेसरों को नजरअंदाज करते हुए अपनी ही पत्नी डॉ. मनीषा मोदी को GUTS का डीन (Dean) नियुक्त कर दिया। यह सीधे तौर पर हितों के टकराव (Conflict of Interest) और खुलेआम भाई-भतीजावाद (Nepotism) का जीता-जागता सबूत है।
- दोषी कर्मचारी को ‘ट्रिपल चार्ज’ और प्रमोशन का इनाम
वर्ष 2015 में अपनी माताजी के फर्जी मेडिकल बिल क्लेम घोटाले में असिस्टेंट अकाउंटेंट (वर्ग-3) कमल मोदी दोषी साबित हुए थे और जांच समिति ने उन्हें बड़ी सजा (Major Penalty) देने की सिफारिश की थी। लेकिन सजा देने के बजाय उन्हें पदोन्नति (प्रमोशन) दी गई और GUTS यूनिवर्सिटी में Registrar, Chief Administrative Officer (CAO) और Chief Accounts Officer—ये तीनों सबसे ताकतवर प्रशासनिक और वित्तीय पद एक साथ सौंप दिए गए।
- बिना NOC के असंवैधानिक भर्ती
जब यूनिवर्सिटी द्वारा CAO के स्थायी पद के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई, तो कमल मोदी को उनके मूल विभाग (IKDRC) से अनिवार्य ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) लिए बिना ही नियुक्त कर दिया गया। यह कदम पूरी भर्ती प्रक्रिया को असंवैधानिक बनाता है।
- इंजीनियर बने ‘परीक्षा नियंत्रक’: सरकारी खजाने की बर्बादी
IKDRC के पास तकनीकी और इंजीनियरिंग स्टाफ पहले से मौजूद होने के बावजूद, GUTS में अलग से सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की भर्ती करके सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डाला गया। ताज्जुब की बात यह है कि इनमें से एक इंजीनियर को उनके मूल काम के बजाय शैक्षणिक रूप से बेहद संवेदनशील Controller of Examinations (परीक्षा नियंत्रक) का प्रभार सौंप दिया गया है।
बड़ा सवाल:
मरीजों की सेवा और मेडिकल शिक्षा के लिए बने ये संस्थान क्या कुछ लोगों के व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रशासनिक अराजकता की बलि चढ़ते रहेंगे? कानून की धज्जियां उड़ाने वाले इन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच कब होगी?

