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संस्कार, सरोकार और साहस का स्वर : सत्ता के नशे में चूर ‘माननीय’ के बिगड़े बोल पुत्र ने थार से 5 को कुचला, पिता (भाजपा विधायक) ने पुलिस को दी धमकी: ‘अपनी औकात में रहो’

गांधीनगर/अहमदाबाद | विशेष संवाददाता : एक तरफ सूबे की पुलिस कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष के एक विधायक ने खाकी की गरिमा को सरेआम तार-तार कर दिया। मामला एक भीषण सड़क हादसे का है, जिसमें भाजपा विधायक के सुपुत्र ने अपनी तेज रफ्तार थार जीप से पांच मासूम लोगों को कुचल दिया। जब पुलिस ने कार्रवाई की कोशिश की, तो विधायक महोदय ने संवेदना दिखाने के बजाय वर्दी को ही उनकी ‘औकात’ याद दिला दी।

घटना का विवरण: मौत की रफ्तार और रसूख का तांडव

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कल देर रात एक बेकाबू थार जीप ने फुटपाथ और सड़क किनारे खड़े पांच लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दो लोगों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। चश्मदीदों का कहना है कि गाड़ी विधायक का बेटा चला रहा था और दुर्घटना के समय गाड़ी की गति निर्धारित सीमा से कहीं अधिक थी।

विधायक की दबंगई: ‘तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ’

जैसे ही पुलिस टीम मौके पर पहुँची और जांच शुरू की, माननीय विधायक महोदय लाव-लश्कर के साथ वहां धमक पड़े। आरोप है कि उन्होंने ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों को सरेआम फटकार लगाई। विधायक ने तीखे लहजे में कहा:

अपनी औकात में रहकर काम करो। यह वर्दी मेरी मेहरबानी से है। केस डायरी में क्या लिखना है, यह मैं तय करूँगा।”
विधायक के इस बर्ताव का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिससे प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

विपक्ष का प्रहार: ‘क्या भाजपा के लिए कानून अलग है?’

इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है। विपक्षी दलों ने सरकार को घेरते हुए पूछा है कि क्या ‘बेटी बचाओ, सुरक्षित सड़क’ के नारे सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित हैं?

मुख्य मांग: विधायक के बेटे पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो।
नैतिकता का सवाल: पुलिस को धमकाने वाले विधायक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

पुलिस का पक्ष

हालांकि स्थानीय पुलिस अधीक्षक (SP) ने कैमरे पर केवल इतना कहा कि “मामले की जांच जारी है और जो भी दोषी होगा, उस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।” लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि पुलिस बल इस समय भारी राजनीतिक दबाव में नजर आ रहा है।

महानगर मेट्रो विचार:

जब रक्षक ही भक्षक को संरक्षण देने लगे और कानून के रखवालों को उनकी ‘औकात’ दिखाई जाने लगे, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? सत्ता का अहंकार जनसेवा के लिए होना चाहिए, न कि जघन्य अपराधों को छिपाने के लिए।

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