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पसीने की हार और सियासत की ‘झालमुड़ी’ : मैं वापस नहीं आऊंगा दोस्त, बता देना सबको…”: रुआंसे गले से निकला यह विदा नहीं, व्यवस्था को श्राप है!

विशेष कवरेज : सूरत के रेलवे स्टेशन की तपती पटरियों पर आज केवल ट्रेनें नहीं दौड़ रही थीं, बल्कि उन हज़ारों ‘मजबूरों’ के अरमानों का दम निकल रहा था, जिन्हें हम कागज़ों पर ‘मज़दूर’ कहते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की ओर जाने वाली ट्रेनों में तिल रखने की जगह नहीं है। 15-15 घंटे कतारों में खड़े रहने के बाद जब पैर जवाब दे जाते हैं, तब जाकर जनरल डिब्बे के किसी कोने में खड़े होने की जगह मिलती है। इसी भीड़ के बीच से एक मज़दूर की नम आँखों ने कैमरे की ओर देखकर वो कह दिया, जो दिल्ली और गांधीनगर के गलियारों को हिला देने के लिए काफी है: “मैं वापस नहीं आऊंगा दोस्त, सबको बता देना।”

भूख की आग और गैस की किल्लत: खाली पेट कैसे चले कारखाने?

सूरत की धड़कन कहे जाने वाले कारखानों के पहिए अब थमने लगे हैं। मज़दूरों का आरोप है कि गैस सिलेंडर की भारी किल्लत ने उनके चूल्हे ठंडे कर दिए हैं।

ब्लैक का बाज़ार: मज़दूरों का कहना है कि जो गैस सिलेंडर खाना बनाने के लिए चाहिए, वह अब पहुंच से बाहर और ‘दोगुने’ दामों पर मिल रहा है।
बंद होती चिमनियाँ: कच्चे माल और गैस की कमी के कारण कारखाने बंद हो रहे हैं, जिससे रोज़ कमाने और खाने वालों के सामने मौत या पलायन—यही दो रास्ते बचे हैं।

सत्ता का ‘भ्रामक’ सच बनाम ज़मीनी हकीकत

हैरानी की बात यह है कि जहाँ हज़ारों मज़दूर अपनी पोटली समेटकर पलायन कर रहे हैं, वहीं सरकारी एयरकंडीशंड कमरों में बैठे अधिकारी इसे ‘भ्रामक समाचार’ बता रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि “मज़दूर तो केवल वेकेशन (छुट्टियाँ) मनाने घर जा रहे हैं।”

महानगर मेट्रो का सवाल: साहब! अगर यह छुट्टियाँ हैं, तो इन आँखों में उत्सव की चमक क्यों नहीं, केवल बेबसी के आंसू क्यों हैं? अगर सब ठीक है, तो 15 घंटे लाइन में खड़े होकर ‘भेड़-बकरियों’ की तरह डिब्बों में क्यों ठुंसा जा रहा है?

सियासत का जायका: जब घर जल रहा हो, तब ‘झालमुड़ी’ का आनंद!

एक तरफ गुजरात का मज़दूर दाने-दाने को तरस रहा है, गैस की किल्लत से चूल्हा नहीं जल रहा, वहीं दूसरी ओर देश के रहनुमा बंगाल की रैलियों में ‘झालमुड़ी’ का लुत्फ उठा रहे हैं। शायद इसलिए भी कि ‘झालमुड़ी’ बनाने के लिए गैस सिलेंडर की ज़रूरत नहीं होती। क्या सत्ता इतनी बहरी हो चुकी है कि उसे गुजरात से उठती ये सिसकियां सुनाई नहीं दे रहीं?

निष्कर्ष: क्या यह ‘आत्मनिर्भर’ भारत है?

आज गुजरात अपनी पहचान खो रहा है। जो हाथ इस राज्य को ‘मॉडल’ बनाते थे, वही हाथ आज जोड़कर विदा मांग रहे हैं। यह पलायन नहीं, यह उस भरोसे की हत्या है जो एक गरीब ने इस शहर पर किया था।

महानगर मेट्रो चेतावनी देता है: अगर आज इन मज़दूरों को रोक नहीं पाए, तो याद रखना, कल कारखानों की मशीनों को चलाने के लिए ‘साहब’ की रैलियों का शोर काम नहीं आएगा।

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