जो आदमी 2008 से जेल में था, उसे कागज़ों में ‘भगोड़ा’ दिखा दिया गया! 18 साल 7 महीने तक एक बेगुनाह आदमी को सिस्टम से लड़कर अपना सच साबित करना पड़ा।
अहमदाबाद / हलोल : जिस सिस्टम का मकसद नागरिकों की सुरक्षा करना, कानून-व्यवस्था बनाना है, उसी सिस्टम के एक कागज़ के टुकड़े ने एक नौजवान की पूरी ज़िंदगी, सपने और ज़िंदगी के ज़रूरी 18 साल बर्बाद कर दिए। हलोल पुलिस स्टेशन की एक बड़ी लापरवाही और बिना जांच के तैयार की गई रिपोर्ट की वजह से एक आदमी को अपनी ज़िंदगी के 18 साल 7 महीने सलाखों के पीछे बिताने पड़े।
क्या है पूरा काला सच?
2008 की घटना और झूठी रिपोर्ट: 2008 में हलोल पुलिस स्टेशन ने एक 20 साल के नौजवान के खिलाफ कोर्ट में ऑफिशियल रिपोर्ट फाइल की थी। जिसमें दावा किया गया था कि आरोपी ‘पुलिस कस्टडी से भाग गया’ और फरार है।
जेल के अंदर, लेकिन कागज़ों पर भगोड़ा: यह पुलिस रिपोर्ट पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठी थी। सच तो यह था कि वह युवक कहीं भागा नहीं था, बल्कि उस समय अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल और महाराष्ट्र की सेंट्रल जेल में सज़ा/कोर्ट की कार्रवाई के तहत बंद था।
बिना जांच के लालीवाड़ी: हलोल पुलिस ने यह पता लगाने के लिए शुरुआती जांच करने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि आरोपी असल में कहां है? कागज़ों पर उसे ‘भगोड़ा’ घोषित करके कोर्ट को भी अंधेरे में रखा गया।
18 साल और 7 महीने की डरावनी लड़ाई
एक 20 साल का युवक, जो अपनी पूरी ज़िंदगी झेलता रहा, साबरमती सेंट्रल जेल की दीवारों से चिल्लाता रहा: “मैं भगोड़ा नहीं हूं! मैं 2008 से जेल में हूं!”
लेकिन इस आवाज़ को बहरे सिस्टम तक पहुंचने में 18 साल और 7 महीने लग गए। इतने सालों तक वह आदमी सिर्फ़ यह साबित करने के लिए जेल में रहा कि वह पुलिस कस्टडी से भागा नहीं था!
बड़े सवाल: इस तबाही का हिसाब कौन देगा?
खाकी पर दाग: हलोल पुलिस ने बिना किसी जांच के कागज़ पर झूठी रिपोर्ट कैसे बना दी?
किसकी ज़िम्मेदारी?: एक 20 साल के नौजवान की ज़िंदगी के सबसे कीमती 18 साल छीन लिए गए, कौन सा अफ़सर या कौन सा सिस्टम उसकी भरपाई करेगा?
इंसाफ़ या देरी?: अगर बेगुनाही साबित करने में 18 साल 7 महीने लग जाएं, तो इसे इंसाफ़ कहेंगे या इंसाफ़ के नाम पर मज़ाक?
आज वो बंदा जेल से छूट गया है, लेकिन 20 साल की उम्र में जेल गया नौजवान आज अपनी ज़िंदगी के बीच में खड़ा है। उसके 18 साल, उसकी विदाई, और उसकी पूरी ज़िंदगी ‘भगोड़े’ का दाग मिटाने में निकल गई। पक्को गुजरात न्यूज़ पूछता है—क्या दोषी पुलिस अफ़सरों पर कार्रवाई होगी, या यह फ़ाइल भी सरकारी धूल में दब जाएगी?

