Homeआर्टिकलनारी शक्ति वंदन या चुनावी दांव? 33% आरक्षण की भूलभुलैया!

नारी शक्ति वंदन या चुनावी दांव? 33% आरक्षण की भूलभुलैया!

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता : केंद्र की भाजपा सरकार ने ‘महिला आरक्षण विधेयक’ को पारित कराकर इतिहास रचने का दावा तो कर दिया, लेकिन इस कानून की हकीकत और इसकी टाइमिंग ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 543 सीटों में से तत्काल 33% आरक्षण देने की नीयत सरकार की नजर नहीं आती। सवाल यह है कि क्या यह ‘नारी शक्ति’ का सम्मान है या फिर 2024 और उसके बाद के चुनावों को साधने का एक ‘मास्टरस्ट्रोक’?

सीमांकन का पेंच: अभी क्यों नहीं?

बिल के प्रावधानों के मुताबिक, आरक्षण तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि देश में नया परिसीमन (Delimitation) न हो जाए। नया परिसीमन नई जनगणना के बाद ही संभव है। इसका सीधा मतलब यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को यह हक नहीं मिलने वाला। जनता पूछ रही है—अगर नीयत साफ थी, तो इसे इसी चुनाव से लागू करने में क्या बाधा थी?

समीकरणों की बिसात: बीजेपी के हाथ में रिमोट कंट्रोल

सबसे बड़ी आशंका नए मत क्षेत्रों (Constituencies) के गठन को लेकर है। जानकारों का कहना है कि:
सीटों का निर्धारण: नए मत विस्तार बनने के बाद 33% सीटें कौन सी होंगी, इसका समीकरण सरकार और चुनाव आयोग की मशीनरी तय करेगी।
राजनीतिक लाभ: आशंका जताई जा रही है कि परिसीमन के जरिए उन क्षेत्रों को आरक्षित किया जा सकता है जहाँ विपक्ष मजबूत है, जिससे समीकरणों को सत्ता पक्ष के अनुकूल मोड़ा जा सके।

चुनावी स्टंट या लंबी वेटिंग लिस्ट?

विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह बिल केवल एक ‘चुनावी लॉलीपॉप’ है।

“जब 2029 या 2034 से पहले यह लागू ही नहीं होना, तो अभी इसका ढिंढोरा पीटना केवल वोट बैंक की राजनीति है।”
बीजेपी इसे अपनी दूरदर्शी सोच बता रही है, लेकिन हकीकत यही है कि महिलाओं को संसद तक पहुँचने के लिए अभी एक दशक का इंतजार और करना पड़ सकता है।

मुख्य बिंदु: जो जनता जानना चाहती है
तुरंत लागू क्यों नहीं? ओबीसी (OBC) कोटे के बिना यह आरक्षण कितना समावेशी है?
परिसीमन का डर: क्या उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच सीटों के संतुलन को बिगाड़ने की यह शुरुआत है?
क्रेडिट की राजनीति: क्या केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के जरिए महिलाओं के वोटों को खिसकाने की कोशिश हो रही है?

महानगर मेट्रो व्यू: लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का अधिकार किश्तों में नहीं मिलना चाहिए। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती है, तो इसे ‘शर्तों’ और ‘तारीखों’ के जाल में फंसाने के बजाय तुरंत अमल में लाना चाहिए था। वरना, यह बिल सिर्फ फाइलों में कैद एक सुनहरा सपना बनकर रह जाएगा।

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