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‘न्याय’ की कसौटी पर खाकी और न्यायपालिका; केजरीवाल की दलील और CBI का ‘अजीब’ तर्क!

जज के बच्चों को सरकारी पैनल में 5,500 केस, फिर भी निष्पक्षता का दावा? दिल्ली हाई कोर्ट में छिड़ा ‘हितों के टकराव’ का महायुद्ध।

ब्यूरो रिपोर्ट | नई दिल्ली : साल 2026 में देश की राजधानी की कानूनी गलियारों में एक ऐसी जंग छिड़ी है, जिसने भारतीय न्यायपालिका और जांच एजेंसियों की साख पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। मुद्दा है—दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की वह अर्जी, जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर अविश्वास जताते हुए खुद को इस केस से अलग करने की मांग की है।

केजरीवाल का वार: ‘पक्षपात की आशंका’

केजरीवाल ने हाई कोर्ट के सामने सीधे और गंभीर तर्क रखे हैं। उनका दावा है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इस मामले में न्याय नहीं कर पाएंगी क्योंकि:

1 वैचारिक जुड़ाव: जस्टिस शर्मा आरएसएस समर्थित ‘अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में कई बार शामिल हो चुकी हैं।
2 हितों का टकराव (Conflict of Interest): जस्टिस शर्मा के पुत्र और पुत्री दोनों केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में शामिल हैं। शपथ पत्र के मुताबिक, उनके बेटे को 2022 से अब तक 5,500 से ज्यादा केस सौंपे गए हैं।
3 डर का माहौल: केजरीवाल का कहना है कि जब जज का परिवार ही सरकार से लाभ ले रहा हो, तो सरकार के खिलाफ फैसला आने की उम्मीद बेमानी है।
CBI का बचाव: ‘तो क्या सब जज अयोग्य हो जाएंगे?’

केजरीवाल की दलीलों पर पलटवार करते हुए CBI ने 16 अप्रैल 2026 को अदालत में जो कहा, उसने नई बहस छेड़ दी है। CBI का तर्क है

अगर केजरीवाल की बात मान ली जाए, तो हर वह जज अयोग्य हो जाएगा जिसके रिश्तेदार सरकारी पैनल में हैं। यह एक गलत मिसाल पेश करेगा और इससे अनैतिक याचिकाकर्ताओं को जजों पर दबाव बनाने और उन्हें बदनाम करने का मौका मिलेगा।”

CBI का कहना है कि जस्टिस शर्मा के बच्चों ने कभी भी ‘एक्साइज पॉलिसी’ केस में कोई पैरवी नहीं की है, इसलिए इसे आधार नहीं बनाया जा सकता।
सियासी साया और ‘प्रतिशोध’ की राजनीति?

इस पूरे मामले ने पुराने जख्मों को भी हरा कर दिया है। चर्चा इस बात की है कि जब कभी अमित शाह को CBI ने गिरफ्तार किया था, तब भाजपा ने एजेंसी पर जमकर हमला बोला था। आज वही CBI अमित शाह के अधीन है और विपक्ष का आरोप है कि वह केवल ‘सरकार की चापलूसी’ कर रही है। संजीव भट्ट से लेकर केजरीवाल तक, एक ही ‘मोડસ ઓપરેન્ડી’ (Modus Operandi) का जिक्र हो रहा है—जो विरोध में है, वो जेल में है।

महानगर मेट्रो का सवाल: क्या यह न्यायपालिका का पतन है?

एक जज के परिवार को हजारों सरकारी केस मिलना क्या महज इत्तेफाक है? क्या सुप्रीम कोर्ट इस ‘सड़न’ पर खामोश रहेगा? जब रक्षक ही सरकार की भाषा बोलने लगें और न्याय की कुर्सी पर बैठे लोगों के निजी हित सरकार से जुड़ जाएं, तो आम आदमी इंसाफ की उम्मीद किससे करे?
CBI की दलील कि “सारे जज अयोग्य हो जाएंगे”, दरअसल न्यायपालिका के भीतर फैले उस जाल को उजागर करती है जिसे अब तक छिपा कर रखा गया था।

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