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गणित का खेल या आर्थिक सच्चाई? मोदी सरकार के पूर्व फाइनेंस सेक्रेटरी सुभाष चंद्र गर्ग का बड़ा धमाका: असली GDP ग्रोथ 7.8% नहीं, सिर्फ 2.6% है! जानिए आंकड़ों का जादू

भारत की अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़ों को लेकर दिल्ली के राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में बड़ा भूचाल आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में फाइनेंस सेक्रेटरी और इकोनॉमिक अफेयर्स सेक्रेटरी जैसे देश के सबसे ऊंचे पदों पर रह चुके सीनियर IAS ऑफिसर सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के आंकड़ों पर जो खुलासे किए हैं, उन्होंने सरकार के दावों की पोल खोल दी है।

जहां सरकार और मीडिया देश की GDP ग्रोथ रेट 7.8% बताकर बड़े-बड़े जश्न मना रहे हैं, वहीं सुभाष चंद्र गर्ग ने सबूतों के साथ दावा किया है कि भारत की असली GDP ग्रोथ 7.8% नहीं, बल्कि सिर्फ 2.6% है! इतने बड़े अंतर ने पूरे देश को हैरान कर दिया है।

आंकड़ों का जादू कैसे हुआ? (कैलकुलेशन में टेक्निकल कमी)

इस कैलकुलेशन को आम नागरिक की समझ में आने वाली भाषा में समझाते हुए गर्ग ने कहा है कि सरकार GDP को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए ‘बेस ईयर रिवीजन’ (पिछले साल के आंकड़ों को कम करने का खेल) का इस्तेमाल कर रही है:

पिछले साल के आंकड़ों में बड़ी गिरावट: सरकार ने अचानक पिछले साल की पहली तिमाही (Q1) की GDP का बेस आंकड़ा 6 लाख करोड़ रुपये (86 ट्रिलियन रुपये से 80 ट्रिलियन रुपये) कम कर दिया है।

ऑटोमैटिक ग्रोथ का जादू: जब आप तुलना के लिए पिछले साल का बेस घटाते हैं, तो मौजूदा साल का परसेंटेज अपने आप ज़्यादा और आकर्षक दिखने लगता है।

असली तस्वीर: अगर सरकार ने पिछले साल के आंकड़ों में यह सुधार या बदलाव नहीं किया होता, तो सरकार के कैलकुलेशन के हिसाब से मौजूदा ग्रोथ सिर्फ़ 2.6% होती!

आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है? (ज़मीनी हकीकत) सुभाष चंद्र गर्ग और आर्थिक जानकारों का मानना ​​है कि 7.8% का आंकड़ा कागज़ पर और PR के लिए बहुत सुंदर दिखता है, लेकिन यह भारत के आम नागरिक की असलियत से बिल्कुल अलग है: मैन्युफैक्चरिंग और कंजम्प्शन में मंदी: देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और आम लोगों की खरीदने की ताकत लगातार कम हो रही है। महंगाई और बेरोज़गारी: अगर देश सच में 7.8% की दर से बढ़ रहा है, तो रोज़गार के नए मौके क्यों नहीं बन रहे हैं? लोगों की सेविंग्स क्यों कम हो रही है और घरों का कर्ज़ क्यों बढ़ रहा है? सरकारी आंकड़ों पर सवाल क्यों? जब देश के पूर्व फाइनेंस सेक्रेटरी रैंक का कोई अधिकारी खुद आंकड़ों की कसरत बताता है, तो यह साबित होता है कि कागज़ पर हो रहे विकास और ज़मीन पर हालात में बहुत बड़ा फ़र्क है। इस चौंकाने वाले दावे ने अब देश की पॉलिटिक्स को भी गरमा दिया है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है और पूछा है कि वह देश की जनता को असली हालात दिखाने के बजाय आंकड़ों से खेल क्यों खेल रही है?

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