RTI एक्टिविस्ट विवेक वेलंकर की मांगी गई जानकारी में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) ने एक बड़ा खुलासा किया है। अगर किसी आम नागरिक या छोटे किसान के होम लोन या एजुकेशन लोन की किस्तें चुकाने में थोड़ी भी देरी होती है, तो बैंक रिकवरी के लिए नोटिस भेजते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि देश के बड़े उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों के लिए सिस्टम के नियम अलग हैं।
NCLT में 1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का ‘हेयरकट’: आंकड़ों का बड़ा खुलासा
RTI से सामने आए आंकड़े देश के सबसे बड़े बैंकिंग सिस्टम पर सवाल उठाते हैं:
309 बड़े अकाउंट्स का समाधान: पिछले नौ सालों (फाइनेंशियल ईयर 2017-18 से 2025-26) में, SBI ने NCLT और दूसरे फोरम के ज़रिए 309 बड़े लोन अकाउंट्स का समाधान किया था।
1.50 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का एनालिसिस: इन अकाउंट्स पर बैंक का 1.50 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क्लेम था, जिसके बदले बैंक सिर्फ़ लगभग 50,000 करोड़ रुपये ही रिकवर कर पाया।
1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का हेयरकट: NCLT में सेटलमेंट के नाम पर बैंक को 1 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का हेयरकट लेना पड़ा।
100 करोड़ रुपये से ज़्यादा के डिफॉल्टर्स का राइट-ऑफ करने के बाद सिर्फ़ 14% रिकवरी!
एक और चौंकाने वाली डिटेल के मुताबिक, 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा के लोन वाले बड़े कर्जदारों के मामले में:
पिछले दस सालों में, SBI ने टेक्निकल या प्रूडेंशियल तरीकों से 1.51 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम ‘राइट-ऑफ’ (बट्टे खाते में डालना) की है।
इतनी बड़ी रकम राइट-ऑफ करने के बाद भी बैंक सिर्फ़ लगभग 20,838 करोड़ रुपये (लगभग 14%) ही रिकवर कर पाया है।
डिफॉल्टर्स के नाम ‘प्राइवेसी’ में छिपाए गए हैं! सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब RTI के तहत 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा के लोन पर डिफॉल्ट करने वाले लोगों और कंपनियों के नाम मांगे गए। बैंक ने कमर्शियल सीक्रेसी और बिज़नेस कॉन्फिडेंशियलिटी के नाम पर RTI एक्ट के सेक्शन 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) का हवाला देते हुए डिफॉल्टर्स के नाम बताने से साफ़ मना कर दिया।
छोटे लोन होल्डर्स के नाम और फोटो प्रेस में छापने वाले बैंक बड़े डिफॉल्टर्स के नाम छिपाने के पीछे सीक्रेसी का पर्दा क्यों डालते हैं, यह एक बड़ा सवाल है।
क्या यह पॉलिसी स्कैम है? लोगों के टैक्स के पैसे का क्या?
जब NCLT और राइट-ऑफ के नाम पर अमीरों के हज़ारों करोड़ रुपये के लोन राइट-ऑफ किए जाते हैं, तो जनता के मन में सवाल उठना लाज़मी है:
किसकी ज़िम्मेदारी?: क्या उन बैंक बोर्ड और अधिकारियों के खिलाफ़ कोई सख्त कानूनी कार्रवाई की गई है जिन्होंने बिना सही सिक्योरिटी के इतने बड़े लोन दिए?
जनता के पैसे का गलत इस्तेमाल: सरकारी बैंकों में जमा पैसा आम जनता की बचत है। अगर इतनी बड़ी रकम के हेयरकट को मंज़ूरी दी जा रही है, तो ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए।
ट्रांसपेरेंसी की कमी: डिफॉल्टर्स के नाम न बताकर बैंकिंग सिस्टम किसे बचा रहा है?
अब इस सिस्टम के खिलाफ़ देश भर में ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी की मांग ज़ोर पकड़ रही है।

