अहमदाबाद | विशेष संवाददाता : गुजरात में 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों (Local Body Elections) का बिगुल बजते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। राज्य की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दल कांग्रेस या आम आदमी पार्टी नहीं, बल्कि खुद पार्टी के भीतर पनप रहा ‘आंतरिक असंतोष’ बनकर उभरा है।
टिकट कटने से ‘अपनों’ में उबाल
भाजपा ने इस बार ‘नो-रिपीट थ्योरी’ और ‘युवा नेतृत्व’ को प्राथमिकता देते हुए कई पुराने और अनुभवी चेहरों के टिकट काट दिए हैं। टिकट वितरण के बाद राज्य के कई शहरों और ग्रामीण इलाकों में पुराने कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी देखी जा रही है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पार्टी का यह साहसिक कदम अब ‘बैकफायर’ कर सकता है। कई वार्डों में पार्टी के पुराने वफादार अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरने की तैयारी कर रहे हैं।
प्रमुख चिंताएँ: ‘घर का भेदी’ ही लंका ढाएगा?
बागी उम्मीदवार: कई क्षेत्रों में भाजपा के बागी उम्मीदवार ही भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशियों के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। यह स्थिति वोटों के ध्रुवीकरण और विभाजन का कारण बन सकती है।
संगाठनिक दरार: भाजपा का सबसे बड़ा हथियार उसका ‘पन्ना प्रमुख’ और बूथ स्तर का संगठन रहा है। लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी के कारण संगठन के काम में वो उत्साह नजर नहीं आ रहा है जो आमतौर पर होता है।
सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency): लंबे समय से सत्ता में होने के कारण स्थानीय स्तर पर कुछ विधायकों और पार्षदों के खिलाफ जनता के साथ-साथ कार्यकर्ताओं में भी रोष है।
विपक्ष को ‘बिना मांगे’ मिल सकता है फायदा
हालांकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इस वक्त संगठनात्मक रूप से कमजोर दिख रही हैं, लेकिन भाजपा के भीतर की कलह उन्हें संजीवनी दे सकती है। भाजपा के ‘इंटरनल डैमेज’ का सीधा लाभ उन सीटों पर मिल सकता है जहाँ जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है।
हाईकमान का ‘डैमेज कंट्रोल’
बढ़ते विरोध को देखते हुए भाजपा आलाकमान ने वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारा है। रुठे हुए कार्यकर्ताओं और पूर्व पार्षदों को मनाने के लिए बंद कमरों में बैठकों का दौर जारी है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि जो कार्यकर्ता पार्टी के खिलाफ काम करेंगे, उन पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

