सेनेट और सिंडिकेट सहित महत्वपूर्ण समितियों में आरएसएस और भाजपा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता देने का दावा; निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद भी पद पर बने रहने को लेकर उठे सवाल
गोधरा (पंचमहल)। गोविंद गुरु विश्वविद्यालय में पूर्व कुलपति के कार्यकाल और विभिन्न शैक्षणिक समितियों में नियुक्तियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कुलपति पर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता प्रभावित करने और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों में राजनीतिक विचारधारा को प्राथमिकता देने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि विश्वविद्यालय को शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखने के बजाय उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश की गई।
विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों और कुछ शिक्षाविदों के हवाले से दावा किया गया है कि सेनेट, सिंडिकेट और अन्य महत्वपूर्ण शैक्षणिक समितियों में नियुक्तियों के दौरान योग्यता और अनुभव के बजाय राजनीतिक जुड़ाव को प्राथमिकता दी गई। आरोप है कि आरएसएस और भाजपा से जुड़े लोगों को इन पदों पर अधिक अवसर दिए गए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित नियुक्तियों के दस्तावेजों की जांच के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा पूर्व कुलपति का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद भी पद पर बने रहना है। आरोप लगाया गया है कि दो कार्यकाल पूरे होने के बावजूद वे कई महीनों तक पद नहीं छोड़ रहे थे। इस दौरान उनके पद पर बने रहने के आधार और नियुक्ति से जुड़े नियमों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस मामले में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उनका कार्यकाल कब समाप्त हुआ, इसके बाद पद पर बने रहने के लिए किस प्रकार का आदेश या प्रशासनिक अनुमति दी गई थी।
मामले को लेकर शिक्षाविदों और छात्र संगठनों के बीच भी असंतोष की बात सामने आ रही है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय जैसी स्वायत्त शैक्षणिक संस्था में नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव शैक्षणिक निर्णयों और संस्थागत नियुक्तियों पर नहीं पड़ना चाहिए।
अब मांग उठ रही है कि विश्वविद्यालय में हुई नियुक्तियों, चयन प्रक्रिया और पूर्व कुलपति के कार्यकाल से जुड़े पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा विभाग की ओर से आरोपों पर स्थिति स्पष्ट की जाए। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित विभाग इन गंभीर आरोपों पर क्या कार्रवाई करते हैं।

