गांधीनगर।* नर्मदा जिले के सागबारा तालुका के 12 से 13 गांवों के किसानों की जंगल की जमीन के मुद्दे को लेकर सरकार और आदिवासी नेता एवं सांसद मनसुख वसावा के बीच हुई बैठक के बाद महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। सरकार ने वर्षों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहे किसानों को नियमों के अनुसार आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत करने पर जमीन का अधिकार देने की दिशा में कार्रवाई करने पर सहमति जताई है।
इसके साथ ही गुजरात में वर्षों से लंबित करीब 80 हजार जंगल की जमीन से जुड़े दावों के निपटारे को लेकर भी बैठक में चर्चा हुई। सरकार की ओर से अब पात्र लाभार्थियों के दावों का आवश्यक दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर निपटारा करने की दिशा में कार्रवाई शुरू करने की बात कही गई है।
करीब 20 वर्षों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहे हैं किसान
सांसद मनसुख वसावा ने बताया कि सागबारा तालुका के 12 गांवों के लोग पिछले करीब 20 वर्षों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों से उमरपाड़ा तालुका के किसानों के साथ जमीन के मुद्दे को लेकर टकराव की स्थिति बनी हुई है, जिसके कारण सामाजिक स्तर पर भी यह मामला गंभीर हो गया है।
जमीन के अधिकार की मांग को लेकर सागबारा क्षेत्र के किसान पिछले 15 से 16 दिनों से धरने पर बैठे हैं। किसानों की मांग और लंबे समय से चले आ रहे विवाद को देखते हुए सरकार ने अब पूरे मामले का मौके पर जाकर समाधान निकालने की दिशा में कदम उठाया है।
रक्षाबंधन के बाद सागबारा जाएंगे दो मंत्री
सरकार ने किसानों से सीधे बातचीत करने के लिए रक्षाबंधन पर्व के बाद मंत्रियों की टीम को सागबारा भेजने का निर्णय लिया है। राज्य के वन मंत्री प्रवीण माली और प्रभारी मंत्री ईश्वरसिंह पटेल रक्षाबंधन के बाद सागबारा पहुंचेंगे।
दोनों मंत्री स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे और आंदोलन कर रहे किसानों से सीधे बातचीत करेंगे। इस दौरान सागबारा क्षेत्र के करीब 1300 किसानों की जमीन से जुड़े मामलों पर भी मौके पर चर्चा की जाएगी।
किस किसानों को जंगल की जमीन पर अधिकार मिल सकता है और इसके लिए कौन-कौन से प्रमाण आवश्यक होंगे, इसकी जानकारी भी किसानों को दी जाएगी।
80 हजार लंबित दावों के निपटारे पर भी चर्चा
मनसुख वसावा ने बताया कि गुजरात में जंगल की जमीन से संबंधित करीब 80 हजार दावे अभी लंबित हैं। बैठक में इन दावों का भी जल्द निपटारा करने को लेकर चर्चा की गई।
सरकार के नियमों के अनुसार जो लोग वर्षों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहे हैं और अपने दावे के समर्थन में आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं, उनके मामलों का दस्तावेजों के आधार पर निपटारा करने की दिशा में कार्रवाई की जाएगी।
‘वन कानून के साथ सरकार के नियमों के आधार पर भी फैसला होना चाहिए’
बैठक के बाद मनसुख वसावा ने कहा कि वन विभाग के अधिकारी वन कानून की बात करते हैं, लेकिन सरकार के नियमों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति वर्षों से जंगल की जमीन पर खेती कर रहा है और उसके पास इसका प्रमाण उपलब्ध है, तो नियमों के तहत उसे जमीन का अधिकार दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसे मामलों में लोगों को जमीन का अधिकार दिया गया है। इसलिए अब भी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर पात्र किसानों के मामलों में कार्रवाई की जानी चाहिए।
पूरी प्रक्रिया में करीब 3 से 4 महीने का समय लग सकता है। हालांकि, सरकार ने सागबारा के किसानों के साथ-साथ लंबे समय से लंबित जंगल की जमीन से जुड़े दावों के समाधान की दिशा में कार्रवाई शुरू करने पर सहमति जताई है।
जाति प्रमाणपत्र सहित आदिवासी समाज के अन्य मुद्दों पर भी चर्चा
सरकार और मनसुख वसावा के बीच हुई बैठक काफी देर तक चली। जंगल की जमीन के दावों के अलावा जाति प्रमाणपत्र सहित आदिवासी समाज से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी चर्चा की गई।
बैठक में उपमुख्यमंत्री *हर्ष संघवी, आदिजाति विकास मंत्री **नरेश पटेल, वन एवं पर्यावरण मंत्री **अर्जुन मोढवाडिया, *जयराम गामित, पी.सी. बरंडा और गणपत वसावा सहित वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
अब सरकार के निर्णय के अनुसार मंत्रियों और अधिकारियों की टीम सागबारा पहुंचकर किसानों से चर्चा करेगी। इस दौरान किसानों के दावों, उपलब्ध प्रमाणों और जमीन की स्थिति की जानकारी ली जाएगी। बैठक में तय किए गए नियमों और आवश्यक दस्तावेजों के आधार पर पात्र किसानों को जंगल की जमीन का अधिकार देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

