जब देश का आम नागरिक और गृहणियां सुबह उठकर चाय का कप हाथ में लेती हैं, तो उन्हें स्वाद के बजाय महंगाई की कड़वी गोली निगलनी पड़ती है। आज भारतीय मिडिल क्लास परिवारों की रसोई पर सरकारी नीतियों की ऐसी जानलेवा कुल्हाड़ी लगी है जिसने गरीबों और मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है। पूरे देश में चीनी की कीमत में 13 परसेंट की तेज और बर्दाश्त न होने वाली बढ़ोतरी हुई है। जो चीनी पहले 40 रुपये प्रति किलो मिलती थी, वह अब गुजरात के बाजारों में 60 से 65 रुपये में बिक रही है। अगर सरकार अपनी नींद से नहीं जागी, तो आने वाले त्योहारों के मौसम में चीनी 70 से 75 रुपये का आंकड़ा पार कर जाएगी।
गाड़ियों का फ्यूल महंगा है या लोगों का पेट? सरकार की दिशाहीन नीति का पर्दाफ़ाश
यह कोई प्राकृतिक आपदा या फसल खराब होने से होने वाली महंगाई नहीं है, यह तो सरकार की खुद बनाई हुई बनावटी कमी है! केंद्र सरकार पर्यावरण और ‘इथेनॉल ब्लेंडिंग’ के नाम पर जो तारीफ़ कर रही है, उसके पीछे कड़वा सच यह है कि देश की चीनी मिलों को गन्ने के रस और चीनी के स्टॉक को गाड़ियों के लिए ‘इथेनॉल’ बनाने की इजाज़त दे दी गई। गाड़ियों के लिए फ्यूल बनाने की होड़ में सरकार ने यह सोचना भी ठीक नहीं समझा कि लोग क्या खाएंगे? गाड़ियों में इथेनॉल मिलाकर पेट्रोलियम कंपनियों के खजाने भरे जा रहे हैं, जबकि आम नागरिक की थाली से ‘मिठास’ छीनी जा रही है।
रसोई का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है: चारों ओर महंगाई का चक्रव्यूह
चीनी सिर्फ़ चाय तक ही सीमित नहीं है। चीनी के दाम बढ़ते ही दूध, बिस्कुट, बेकरी प्रोडक्ट, मिठाई और रोज़मर्रा की चीज़ें बनाने वाली कंपनियों ने दाम बढ़ने का बोझ सीधे ग्राहकों पर डाल दिया है। एक तरफ़ चीनी के दाम आसमान छू रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ तेल, आटा, गैस सिलेंडर और हरी सब्ज़ियों के दाम पहले से ही आसमान छू रहे हैं। जैसे-जैसे त्योहार पास आ रहे हैं, गरीब और मिडिल क्लास परिवार अपने बच्चों को मिठाई खिलाने के बारे में भी सौ बार सोचने पर मजबूर हो रहे हैं।
ज़ुल्म बंद करो, कागज़ पर फ़ैसले छोड़कर लोगों को राहत दो!
हालात हाथ से निकलने के बाद सरकार कहती है कि ‘बल्क स्टॉक लिमिट आधी कर दी गई है’ और ‘हम इम्पोर्ट पर विचार कर रहे हैं।’ ये सिर्फ़ कागज़ के नाटक हैं! अगर सरकार को सच में जनता के हित की चिंता है, तो:
इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन तुरंत कैंसल किया जाना चाहिए।
ब्लैक मार्केट करने वालों और बड़े चीनी जमाखोरों पर रेड करके स्टॉक खोला जाना चाहिए।
गरीब और मिडिल क्लास को राशन की दुकानों के ज़रिए सस्ते रेट पर चीनी दी जानी चाहिए।
‘महानगर मेट्रो’ सरकार को सीधी चुनौती
क्या देश का गरीब और मिडिल क्लास सिर्फ़ टैक्स देने और सरकारी पॉलिसी का शिकार होने के लिए जीता है? गाड़ियां बचाने के लिए लोगों के पेट पर पैर रखने की यह पॉलिसी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर सरकार ने तुरंत कीमतों पर कंट्रोल नहीं किया, तो जनता का गुस्सा सड़कों पर दिखेगा। ‘महानगर मेट्रो न्यूज़’ लोगों की रसोई पर हो रही इस डकैती के खिलाफ आवाज़ उठाता रहेगा और सरकार को ज़िम्मेदार ठहराता रहेगा!

