गुजरात की पॉलिटिक्स और सोशल लाइफ़ में शांति दिख रही है। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हो रहा, सड़कों पर कोई प्रोटेस्ट नहीं हो रहा। लेकिन क्या यह शांति राज्य के लोगों की खुशहाली की निशानी है? बिल्कुल नहीं! यह शांति जनता की संतुष्टि नहीं, बल्कि ‘लाचारी’ और सरकारी सिस्टम से भरोसे के पूरी तरह खत्म होने की निशानी है।
गुजरात के नागरिकों ने सरकार से बुनियादी अधिकार माँगना बंद कर दिया है, क्योंकि उन्हें अपनी मेहनत की कमाई से ‘प्राइवेट ऑप्शन’ खरीदने की आदत हो गई है। लेकिन यह आदत आज मिडिल और गरीब क्लास के लिए एक आर्थिक जाल बन गई है।
- एजुकेशन का कमर्शियलाइज़ेशन: प्राइमरी स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक, लूट का खुला खेल
सरकारी स्कूलों में हज़ारों टीचर की पोस्ट खाली हैं, कमरे टूटे-फूटे हैं और सरकारी सिस्टम एजुकेशन का लेवल सुधारने में पूरी तरह फेल रहा है। इस वजह से, एक आम कमाने वाला या मज़दूर भी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में भेजने को मजबूर हो गया है।
स्कूल एजुकेशन: हर साल डोनेशन, महंगी फीस, कंपाउंडिंग चार्ज, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर पेरेंट्स को दबाया जा रहा है।
हायर एजुकेशन: सरकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में सीटें कम कर दी गई हैं, ताकि सेल्फ-फाइनेंस और प्राइवेट यूनिवर्सिटी का धंधा फल-फूल सके। आज, पेरेंट्स अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई के लिए लाखों रुपये का ‘एजुकेशन लोन’ लेते हैं और पूरी ज़िंदगी उसका ब्याज चुकाते रहते हैं।
- हेल्थ सेक्टर में लूट: सरकारी नौकर की मौत और प्राइवेट अस्पतालों में बिलों की लूट
सरकारी अस्पतालों में लाइनें, दवा की कमी, खराब स्ट्रेचर और डॉक्टरों का न होना रोज़ की बात हो गई है। इन दिक्कतों से तंग आकर लोग अपनों की जान बचाने के लिए प्राइवेट कॉर्पोरेट अस्पतालों का सहारा लेते हैं।
इंसानी बिलिंग: प्राइवेट अस्पताल एक ICU बेड या छोटे ऑपरेशन के लिए लाखों रुपये चार्ज करते हैं। कैपिटल का खत्म होना: परिवारों को अपनी ज़िंदगी भर
की सेविंग्स, प्लॉट या महिलाओं के गहने बेचकर हॉस्पिटल के बिल भरने पड़ते हैं। सरकार ‘आयुष्मान कार्ड’ को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन प्राइवेट हॉस्पिटल में कार्ड होल्डर्स के साथ भेदभाव और गड़बड़ियां जगजाहिर हैं।
- परमानेंट नौकरी का खत्म होना: कॉन्ट्रैक्ट प्रोसेस और युवाओं का शोषण
सरकार ने खुद ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘कॉन्ट्रैक्ट’ के तरीके अपनाकर युवाओं के शोषण की नींव रखी है। सरकारी सेक्टर में भर्तियां सालों तक रुकी रहती हैं या पेपर लीक हो जाते हैं।
दूसरी तरफ, प्राइवेट कंपनियां और आउटसोर्सिंग एजेंसियां 12-12 घंटे काम के लिए सिर्फ ₹8,000 से ₹12,000 की मामूली सैलरी देती हैं। न PF, न ग्रेच्युटी, न जॉब सिक्योरिटी! पढ़ा-लिखा युवा फाइनेंशियली बर्बाद हो रहा है लेकिन उसके पास विरोध करने का न तो समय बचा है और न ही ताकत।
- पीने का पानी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट: टैक्स देने के बाद भी प्राइवेट पर डिपेंडेंस!
पानी का व्यापार: नगर पालिकाएँ और नगर पालिकाएँ करोड़ों रुपये का पानी का टैक्स वसूलती हैं, फिर भी घरों में गंदा, बदबूदार और केमिकल वाला पानी आता है। सरकार से साफ पानी माँगने के बजाय, जनता घर पर R.O. प्लांट लगाती है या ₹30 से ₹50 प्रतिदिन के हिसाब से पानी के जग खरीदती है।
प्राइवेट ट्रांसपोर्ट: सरकारी ST बसों या लोकल सिटी बसों के अनियमित या छोटे रूट होने के कारण, लोगों को अपनी निजी गाड़ियों में महंगा पेट्रोल-डीज़ल
फूंकने या निजी यात्रा के लिए ज़्यादा किराया देने पर मजबूर होना पड़ता है।
जनता को जगाने का समय: यह चुप्पी आपकी बर्बादी है!
गुजरात के लोगों को समझना होगा कि आप सड़क, रास्ते, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए सरकार को ‘डायरेक्ट’ और ‘इनडायरेक्ट’ टैक्स देते हैं। टैक्स देने के बाद भी, अगर आपको हर सर्विस प्राइवेट सेक्टर से ऊँची कीमत पर खरीदनी पड़े, तो यह सरकार की सबसे बड़ी एडमिनिस्ट्रेटिव और नैतिक नाकामी है। अगर जनता अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज़ नहीं उठाएगी और इसी तरह ‘प्राइवेट ऑप्शन’ के लिए अपनी जेबें खाली करती रहेगी, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सरकारी सुविधाएं सिर्फ़ इतिहास के पन्नों पर ही रह जाएंगी!

