शेरों के दूसरे घर बरदा डूंगर में 4 महीने से बेपरवाह गैर-कानूनी माइनिंग: 17 एशियाई शेरों का वजूद खतरे में, मिनरल माफिया का करोड़ों के सरकारी प्रोजेक्ट्स पर कब्ज़ा
पोरबंदर: राज्य के फॉरेस्ट और एनवायरनमेंट मिनिस्टर अर्जुन मोढवाडिया के होम ग्राउंड पोरबंदर में एनवायरनमेंट और वाइल्डलाइफ को खुलेआम खत्म किया जा रहा है। चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि लैंड माफिया ने फॉरेस्ट मिनिस्टर के सामने ही पूरी पहाड़ी खोद डाली। पूरी पहाड़ी गैर-कानूनी तरीके से खोदी गई है, ठीक राणावाव तालुका में लधाधर बस स्टैंड के पीछे, पोरबंदर-जामनगर हाईवे के पास। यह गैर-कानूनी माइनिंग, जो सड़क से साफ दिख रही है, पिछले 4 महीने से चल रही है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारी अंधेरे में रहे या जानबूझकर आंखें मूंद लीं, यह अब एक बड़ा सवाल बन गया है। 17 शेरों के घर पर ‘गैर-कानूनी’ माइनिंग पर स्ट्राइक
इस पूरे स्कैम में सबसे गंभीर और चिंता की बात यह है कि यह वही बरदा डूंगर पंथक है, जहां सरकार एशियाई शेरों के रहने और ब्रीडिंग के लिए करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट चला रही है।
विरासत पर हमला: 1879 के बाद पहली बार इस इलाके में शेर लौटे हैं।
शेरों की आबादी: बरदा सैंक्चुअरी इलाके में अभी कुल 17 एशियाई शेर रहते हैं, जिनमें 6 बड़े और 11 बच्चे हैं।
बड़ा इलाका: 192.31 स्क्वायर किलोमीटर में फैला यह सैंक्चुअरी पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में फैला है और इसमें 40 शेरों को रखने की कैपेसिटी है।
टूरिज्म और सफारी: हाल ही में यहां बरदा सफारी भी शुरू की गई है। एक तरफ सरकार बरदा को शेरों का ‘दूसरा घर’ बनाकर टूरिज्म डेवलप करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ लैंड माफिया फॉरेस्ट मिनिस्टर के इलाके में शेरों के नेचुरल हैबिटैट को पत्थर दर पत्थर बेच रहे हैं!
घोटाला पर घोटाला: पहाड़ खोदकर बनाई सड़कें भी ढह गईं!
पता चला है कि लैंड माफिया ने पहाड़ खोदकर जो पत्थर निकाले थे, उनका इस्तेमाल पोरबंदर में सड़कें बनाने में किया गया। यानी, घोटाले के ऊपर एक और घोटाला! एक तरफ नेचुरल एस्टेट चोरी हो गया और दूसरी तरफ उन्हीं पत्थरों से बनी सड़कें भी जल्द ही ढह गईं। करप्शन की इस दोहरी मार में जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये डूब गए।
कलेक्टर का ‘लूलो बचाओ’ और एडमिनिस्ट्रेशन की लाचारी
पूरी पहाड़ी गायब होने तक चार महीने तक सोता रहा एडमिनिस्ट्रेशन मीडिया में रिपोर्ट आने के बाद जांच का ड्रामा शुरू कर चुका है। पोरबंदर कलेक्टर एच. डी. धनानी ने इस पर सफाई देते हुए कहा:
“मीडिया में रिपोर्ट आने के बाद जांच की गई। यह लीज़ 2030 तक के लिए मंज़ूर है, लेकिन एनवायरनमेंट क्लियरेंस (EC) नहीं मिलने की वजह से इसकी माइनिंग रोक दी गई और ATR को लॉक कर दिया गया। सिर्फ़ पहले बताई गई क्वांटिटी को ही एक्सपोर्ट करने की इजाज़त दी गई। अगर इससे ज़्यादा क्वांटिटी निकाली गई, तो उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी।”
अब सवाल यह उठता है कि अगर एनवायरनमेंट क्लियरेंस नहीं था और माइनिंग रोक दी गई थी, तो फिर 4 महीने तक दिन-दहाड़े JCB और डंपर चलाकर पूरी पहाड़ी किसने खोदी? प्रशासन का यह बचाव साफ़ तौर पर अपनी नाकामी छिपाने की एक बेकार कोशिश लग रही है।
महानगर मेट्रो से सीधे सवाल:
- अगर फॉरेस्ट और एनवायरनमेंट मिनिस्टर अर्जुन मोढवाडिया के इलाके में शेरों का घर सुरक्षित नहीं है, तो राज्य के दूसरे जंगलों का क्या?
- हाईवे से साफ़ दिख रही माइनिंग माइंस और मिनरल्स डिपार्टमेंट और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को क्यों नहीं दिखी?
- बिना एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस के इतने बड़े पैमाने पर माइनिंग करने वाले लैंड माफियाओं के पीछे कौन से पॉलिटिकल बॉस हैं?
पूरा गुजरात इन माफियाओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई का इंतजार कर रहा है जो गैर-कानूनी माइनिंग के जरिए प्रकृति और शेरों के अस्तित्व से खिलवाड़ कर रहे हैं।

