NTA और एजुकेशन मिनिस्ट्री में बड़ा फर्क, इस्तीफे की मांग पेपर लीक का गुस्सा है या नई एजुकेशन पॉलिसी का बदला?
नई दिल्ली/अहमदाबाद : NEET-UG एग्जाम में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर पूरे देश में हर तरफ हंगामा मचा हुआ है। स्टूडेंट्स और विपक्षी नेता सड़कों पर उतरकर भारी विरोध कर रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद में एक बहुत ही चौंकाने वाला पॉलिटिकल इक्वेशन सामने आ रहा है, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
टेक्निकली और एडमिनिस्ट्रेटिवली, NEET एग्जाम नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी NTA कंडक्ट करती है, जिसके हेड प्रदीप कुमार जोशी हैं। लेकिन प्रदर्शनकारियों का मुख्य तीर और इस्तीफे की सीधी मांग देश के एजुकेशन मिनिस्टर धर्मेंद्र प्रधान पर निशाना साध रही है।
अब सवाल उठता है कि क्यों? क्या यह लड़ाई सिर्फ स्टूडेंट्स के इंसाफ तक ही सीमित है या इसके पीछे कोई गहरा पॉलिटिकल एजेंडा काम कर रहा है?
क्या वजह सिर्फ NEET है… या नई एजुकेशन पॉलिसी से नाराजगी?
पॉलिटिकल एनालिस्ट्स के मुताबिक, इस पूरे विरोध के पीछे वजह सिर्फ पेपर लीक नहीं हो सकती। एजुकेशन मिनिस्ट्री द्वारा हाल ही में लागू की गई ‘नई एजुकेशन पॉलिसी’ (NEP) और करिकुलम में किए गए ऐतिहासिक बदलावों से एक खास वर्ग और विचारधारा में भारी नाराज़गी है।
जब से एजुकेशन डिपार्टमेंट ने करिकुलम में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं:
भारतीय संस्कृति और हिंदू राजाओं की विरासत: मुगल इतिहास की बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई कहानी के बजाय, भारतीय राजाओं, मौर्य साम्राज्य, मराठा साम्राज्य और हिंदू शासकों के असली कारनामों को टेक्स्टबुक्स में सही और सम्मानजनक जगह दी गई।
इमरजेंसी के काले अध्याय का सच: इंदिरा गांधी द्वारा देश पर लगाई गई इमरजेंसी और उनके लोकतंत्र विरोधी काले कामों का सच नई पीढ़ी तक पहुंचाने का फैसला किया गया।
तब से, एक खास राजनीतिक गुट को गुस्सा आ रहा था और वे एजुकेशन मिनिस्ट्री पर निशाना साधने के मौके की तलाश में थे।
पॉलिटिक्स बनाम पेपर लीक्स: यह गुस्सा पहले कहां था?
अगर मुद्दा सच में सिर्फ स्टूडेंट्स के हितों और पेपर लीक का होता, तो पहले भी देश के कई राज्यों में दर्जनों बड़े पेपर लीक स्कैंडल सामने आ चुके होते। लाखों स्टूडेंट्स का भविष्य पहले भी डगमगाया है। लेकिन तब देश भर में इतना हंगामा, दिल्ली में बड़े आंदोलन और एजुकेशन मिनिस्टर के इस्तीफे की सीधी मांग क्यों नहीं हुई?
आज जो नाराज़गी पैदा हुई है, वह स्टूडेंट्स के इंसाफ के लिए कम और पॉलिटिकल हिसाब-किताब बराबर करने के लिए ज़्यादा लग रही है।
‘महानगर मेट्रो ‘ एनालिसिस: सच और इंसाफ के बीच की बारीक लाइन
पेपर लीक करने वाले को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। देश के मेहनती स्टूडेंट्स के लिए इंसाफ प्राथमिकता है और इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।
लेकिन अगर पॉलिटिकल पार्टियां NEET के बहाने एजुकेशन सेक्टर में हो रहे देशव्यापी और क्रांतिकारी सुधारों को रोकने या बदला लेने की कोशिश कर रही हैं, तो देश का जागरूक नागरिक इस खेल को अच्छी तरह समझ रहा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि… यह विरोध NEET में हुई गड़बड़ियों का है या एजुकेशन में सामने आई ऐतिहासिक सच्चाई का?

