मुंबई की मीठी नदी शहर से होकर बहती हुई पवई और विहार झीलों के अतिरिक्त जल को अपने साथ बहा ले जाती है। मीठी नदी मुंबई के घनी आबादी वाले और इंडस्ट्रियल एरिया से होकर गुजरती है। यह आगे जाकर माहिम क्रीक में अरब सागर में जाकर मिल जाती है। मीठी नदी की लंबाई लगभग 18 किलोमीटर है।
मुंबई : मीठी नदी खर-पतवार, प्लास्टिक और कचरे से भर गई है। BMC ने इस साल 10 जून तक मीठी नदी से गाद निकालने की मियाद तय की थी, लेकिन काम नहीं हो पाया। बाद में नए ठेकेदार को जिम्मा सौंपा गया, पर बारिश आने तक सिर्फ 64% गाद ही हटाई जा सकी।
गहरा संकट
मुंबई की मीठी नदी से पांच मिनट की दूरी पर भारत का सबसे महंगा कारोबारी इलाका बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) है। प्रमुख बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के साथ-साथ यहीं पर नैशनल स्टॉक एक्सचेंज और बंबई स्टॉक एक्सचेंज भी हैं। यहां दफ्तरों का किराया हर महीने औसतन 350 रुपये प्रति वर्ग फुट है। इसके बावजूद, मीठी नदी बदहाल है।
समस्या जस की तस
2005 की भीषण बाढ़ के बाद सरकार ने मीठी नदी के लिए 3,500 करोड़ रुपये से अधिक का बजट तय किया था। इनमें से तकरीबन 2,200 करोड़ रुपये खर्च भी हो चुके हैं। नदी अब भी प्रदूषित है। अधिकांश प्रदूषण बिना ट्रीट किए सीवेज से आता है। पानी की गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। 2020-21 में नदी का वॉटर क्वॉलिटी इंडेक्स 100 में से 44 था। हर साल गाद निकालने, चैनल चौड़ा करने और दीवारें बनाने का काम दोहराया जाता है, लेकिन तय समय पर पूरा नहीं होता और समस्या जस की तस है।
अधूरी परियोजनाएं
पिछले साल मीठी नदी के लिए एक बार फिर कई परियोजनाओं की घोषणा हुई, लेकिन अधिकांश अब भी अधूरी हैं। 455 करोड़ रुपये की सीवेज टनल तैयार है, पर ट्रीटमेंट प्लांट शुरू न होने से बेकार पड़ी है। नदी का प्रबंधन कई एजेंसियों के जिम्मे है। इस कारण समन्वय की कमी बनी रहती है।
दुनिया से सबक
दुनिया के कई शहरों ने साबित किया है कि बदहाल नदियों को दोबारा जीवित किया जा सकता है। सियोल ने 2005 में 50 बरस से दबी चेओंगग्येचेओन (Cheonggyecheon) धारा को पुनर्जीवित करने के लिए करीब 38 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। 1970 के दशक के अंत तक सिंगापुर ने भी सीवेज व्यवस्था, उद्योगों के स्थानांतरण और सख्त प्रदूषण नियंत्रण के जरिये अपनी प्रदूषित नदी को एशिया के सबसे आकर्षक वॉटरफ्रंट में तब्दील कर दिया।
रणनीति से बदलाव
छत्रपति संभाजीनगर की खाम नदी भी कभी मीठी नदी जैसी बदहाल थी। सुनियोजित रणनीति से उसका कायाकल्प किया गया। परियोजना पर 4.5 करोड़ रुपये से अधिक रकम खर्च की गई, जो मीठी नदी की सालाना गाद सफाई लागत का एक फीसदी भी नहीं। असल में, समाधान केवल गाद निकालने में नहीं, सरकार, उद्योगों और विशेषज्ञों की साझेदारी वाले मॉडल में है।

