‘कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम’ के नाम पर चल रहे काले धन पर सरकार का हथौड़ा, भ्रष्टाचार के जनक के समान; ‘पाको गुजरात’ जनता के हित में इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करता है!
गांधीनगर/अहमदाबाद, : राज्य सरकार ने गुजरात सरकार के अलग-अलग ऑफिसों में चल रहे भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद को जड़ से उखाड़ने के लिए एक बहुत ही क्रांतिकारी और ऐतिहासिक फैसला लिया है। सरकार ने अब तक सरकारी ऑफिसों में भ्रष्टाचार के लिए जो सबसे बड़ा लूपहोल माना जाता था, उस पर कानून का शिकंजा कस दिया है। राज्य सरकार के अहम डिपार्टमेंट्स द्वारा लिए गए फैसले के मुताबिक, अब से सरकारी ऑफिसों में काम करने वाले सभी आउटसोर्स, कॉन्ट्रैक्ट या पार्ट-टाइम कर्मचारी भी कानून की नज़र में ‘पब्लिक सर्वेंट’ माने जाएंगे। अगर वे रिश्वत लेते या करप्शन करते पकड़े गए, तो उन्हें एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) और कानून के तहत जेल ले जाया जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे किसी परमानेंट क्लास-1 या क्लास-2 ऑफिसर को भेजा जाता है!
कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम: करप्शन का AP सेंटर!
यह बात बहुत चर्चा में है कि सरकारी सिस्टम में करप्शन की असली शुरुआत इसी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम और आउटसोर्सिंग से हुई है। परमानेंट सरकारी कर्मचारी पकड़े जाने के डर से सीधे रिश्वत लेने से बचते थे और आउटसोर्सिंग पर रखे गए कंप्यूटर ऑपरेटर, क्लर्क या चपरासी जैसे छोटे कर्मचारियों को फाइलें पास करवाने या पैसे ट्रांसफर करवाने के लिए मोहरे की तरह इस्तेमाल करते थे। जब ऐसे कॉन्ट्रैक्ट वाले कर्मचारी रिश्वत के मामलों में पकड़े जाते थे, तो वे कानूनी परिभाषा में कमी का फायदा उठाकर या ‘हम सरकारी कर्मचारी नहीं हैं’ का बहाना बनाकर बच निकलते थे या मुख्य दोषी बच निकलते थे। लेकिन अब यह काला खेल हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
प्रॉसिक्यूशन अप्रूवल के नाम पर होने वाली देरी का परमानेंट अंत!
आमतौर पर रिश्वत के मामलों में पकड़े गए बड़े लोगों पर कोर्ट में केस चलाने के लिए संबंधित डिपार्टमेंट से ‘सरकारी मंज़ूरी’ मिलने में महीनों या सालों लग जाते थे, जिसका सीधा फ़ायदा अपराधियों को होता था। लेकिन अब सरकार ने इस नई पॉलिसी से पुलिस और ACB के लिए भ्रष्ट लोगों पर नकेल कसना आसान कर दिया है। सरकारी आदेश के मुताबिक, अगर कोई आउटसोर्सिंग कर्मचारी भी जनता से एक रुपया रिश्वत मांगता है, तो उसे सरकारी कर्मचारी माना जाएगा और उस पर एंटी-करप्शन एक्ट की सभी खतरनाक धाराएं लागू होंगी।
‘पक्को गुजरात’ का ज्वलंत सवाल – क्या छोटी मछलियां पकड़ी जाएंगी या मगरमच्छ भी जेल जाएंगे?
गुजरात सरकार का यह कदम सौ फ़ीसदी स्वागत योग्य है और इस फ़ैसले से लोगों में बहुत खुशी है। लेकिन ‘पक्को गुजरात’ सिस्टम से एक ज्वलंत सवाल भी पूछता है:
आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को ‘सरकारी कर्मचारी’ बताकर जेल में डालने के साथ-साथ, कानून के हाथ उन मगरमच्छों तक कब पहुंचेंगे जो इन छोटे कर्मचारियों से काली कमाई करते थे? क्या सच में सरकारी ऑफिस में आम लोगों का काम बिना किश्तों और बिना रिश्वत के समय पर हो जाएगा?
सरकार ने नियम तो कड़े कर दिए हैं, अब देखना यह है कि ACB और पुलिस एडमिनिस्ट्रेशन इस नियम को कितनी सख्ती से लागू करते हैं। जनता अब जागरूक हो गई है और भ्रष्टाचार मुक्त गुजरात देखना चाहती है!

