सेफ्टी रेलिंग गायब, मोड़ पर मौत का जाल: क्या प्रशासन किसी बड़ी जान-माल के नुकसान और गंभीर हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
एक तरफ़ मॉनसून के मौसम में प्रकृति खिलखिला रही है, वहीं दूसरी तरफ़ डभोई तालुका में मंडला रोड पर प्रशासन की सख़्त पॉलिसी के कारण यही प्राकृतिक पेड़-पौधे गाड़ी चलाने वालों के लिए मौत का कारण बन रहे हैं। मंडला गांव से गुज़रने वाली मुख्य सड़क इतनी खतरनाक हो गई है कि गाड़ी चलाने वाले अपनी जान हथेली पर रखकर गुज़रने को मजबूर हैं। सड़क और बिल्डिंग डिपार्टमेंट सड़क के दोनों ओर उगी झाड़ियों के साम्राज्य को नज़रअंदाज़ कर रहा है।
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट देखें… सेफ्टी रेलिंग ढकी, बड़ा मोड़ बना ब्लाइंड स्पॉट
स्थानीय लोगों के अनुसार, मंडला गांव की ओर आने वाली मुख्य सड़क पर एक बड़ा और तीखा मोड़ है। गाड़ी चलाने वालों की सेफ्टी के लिए लगाई गई लोहे की सेफ्टी रेलिंग इन झाड़ियों में पूरी तरह ढक गई हैं। झाड़ियां इतनी बढ़ गई हैं कि दूसरी तरफ से आने वाली गाड़ी बिल्कुल भी दिखाई नहीं देती। मॉनसून की बारिश में यह झाड़ियां और भी घनी हो जाने से हालात और खराब हो गए हैं। नतीजतन, यहां हर दिन छोटे-बड़े एक्सीडेंट हो रहे हैं और रात के घने अंधेरे में गाड़ियां पलट रही हैं।
सरकारी नियम: गर्मियों में प्री-मॉनसून काम क्यों नहीं किया गया?
नियम कहता है कि मॉनसून शुरू होने से पहले, यानी गर्मियों के मौसम में ही हाईवे और मेन सड़कों के आसपास दिक्कत पैदा करने वाली झाड़ियों, टहनियों और घास को साफ करना होता है। अगर गर्मियों में करोड़ों रुपये का प्री-मॉनसून काम सिर्फ कागजों पर न हुआ होता, तो आज मॉनसून में इतनी बुरी हालत नहीं होती! लेकिन रोड्स एंड हाउसिंग डिपार्टमेंट के करप्ट और आलसी एडमिनिस्ट्रेशन ने जनता की सेफ्टी की भी परवाह नहीं की है।
जनता का ज्वलंत सवाल: क्या एडमिनिस्ट्रेशन किसी की जान जाने के बाद ही जागेगा? लगातार हो रहे हादसों और आस-पास के गांववालों की कई बार गुहार के बावजूद, कुंभकर्ण की नींद सो रहा एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम क्यों नहीं जाग रहा है? लोगों में बस यही बहस चल रही है कि क्या एडमिनिस्ट्रेशन अभी भी किसी बड़ी जान जाने या किसी बेगुनाह परिवार के बसेरे के उजड़ने का इंतज़ार कर रहा है? क्या इस बेचारे एडमिनिस्ट्रेशन के पेट में तभी पानी आएगा जब किसी की जान जाएगी और यहां सफाई के लिए JCB आएगी?
इस सड़क से हर दिन सैकड़ों गाड़ी वाले और यात्री गुज़रते हैं, जिन्हें हर दिन मौत के डर से सफ़र करना पड़ता है। अब देखना यह है कि ये खतरनाक झाड़ियां कब साफ़ होंगी और सिस्टम कब जागेगा।

