Homeभारतगुजरातहेडलाइन : डभोई की यह सड़क 14 साल से 'मौत का कुआं'...

हेडलाइन : डभोई की यह सड़क 14 साल से ‘मौत का कुआं’ बनी हुई है: प्रशासन की भारी लापरवाही या नेताओं की लापरवाही?

एक ​​तरफ जहां डभोई तालुका के ग्रामीण इलाकों में शानदार और पक्की सड़कों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन की ऐसी भारी लापरवाही सामने आई है जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का खून खौल उठे। तालुका में मंडला गांव को संधा गांव से जोड़ने वाली लगभग 1.5 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़क पिछले 14 सालों यानी डेढ़ दशक से बेहद खस्ताहाल स्थिति में है। स्थानीय ग्रामीणों द्वारा सालों से गुहार लगाने के बावजूद प्रशासन पर कोई असर नहीं हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है।

तारकोल गायब, बस बड़े-बड़े गड्ढों और बजरी का साम्राज्य

मिली जानकारी के अनुसार, इस डेढ़ किलोमीटर लंबी सड़क से तारकोल गायब हो चुका है। जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं और पूरी सड़क पर अनगिनत छोटे-बड़े गड्ढे हो गए हैं। सड़क की हालत पूरी तरह ऊबड़-खाबड़ और खराब हो गई है। इस सड़क से गुजरना ऐसा है जैसे अपनी जान हथेली पर रखकर ‘मौत के कुएं’ से गुजरना।

मानसून में स्थिति और भी जानलेवा हो गई है: कभी भी बड़े हादसे का डर

हालिया बारिश के कारण इस खस्ताहाल सड़क की स्थिति और भी दयनीय और खतरनाक हो गई है। सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्ढों में बारिश का पानी भर जाने के कारण वाहन चालकों को गड्ढों की गहराई का पता नहीं चलता। नतीजतन, यहां हर दिन छोटे-बड़े हादसे हो रहे हैं। ग्रामीण डर के साये में जी रहे हैं और निकट भविष्य में किसी बड़े हादसे की प्रबल संभावना है। क्या प्रशासन किसी की मौत की खबर का इंतजार कर रहा है?
चार वर्ग जो नारकीय स्थितियों को झेलने को मजबूर हैं:

मासूम स्कूली छात्र: हर सुबह, स्कूल जाते समय इस खतरनाक सड़क से गुजरने वाले बच्चों और उनके माता-पिता की जान जोखिम में रहती है।

दुनिया की दौलत (किसान): अपनी उपज और ट्रैक्टर या अन्य वाहनों के साथ यहां से गुजरने वाले किसानों को भारी शारीरिक परेशानी के साथ-साथ अपने वाहनों के नुकसान का आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है। रोज़ाना आने-जाने वाले लोग: काम और कारोबार के सिलसिले में आने-जाने वाले स्थानीय लोगों के लिए डेढ़ किलोमीटर की यह सड़क मुसीबत का सबब बन गई है और लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

आपातकालीन सेवाओं पर असर: किसी गंभीर बीमारी या डिलीवरी के समय एम्बुलेंस जैसी गाड़ियों को भी इन गांवों तक पहुँचने में बहुत मुश्किल होती है, जो मरीज़ों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

14 साल से सिर्फ़ कागज़ों पर ही गुहार: क्या नेता सिर्फ़ चुनाव के समय ही सक्रिय होते हैं?

स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका गंभीर आरोप है कि वे पिछले 14 सालों से विधायक, सांसद और सड़क व आवास विभाग के ज़िम्मेदार अधिकारियों से लिखित और मौखिक रूप से गुहार लगाकर थक चुके हैं। चुनाव के समय नेता हाथ जोड़कर वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही इस सड़क और जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। आज तक इस सड़क की किस्मत नहीं बदली है।

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