Homeभारतमहाराष्ट्रामयूरपंख विवाद पर जैन समाज को गंभीर चिंतन की आवश्यकता: डा. अखिल...

मयूरपंख विवाद पर जैन समाज को गंभीर चिंतन की आवश्यकता: डा. अखिल बंसल। ।

जीवनलाल जैन नागदा की रिपोर्ट

मोरपंख (मयूरपिच्छी) को लेकर समय-समय पर उठने वाले विवाद अब केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहे हैं। हाल ही में कुछ सार्वजनिक मंचों पर यह आरोप लगाया गया कि जैन मुनियों द्वारा प्रयुक्त मयूरपिच्छी के लिए बड़ी संख्या में मोरों की हत्या की जाती है। ऐसे आरोपों ने जैन समाज की भावनाओं को आहत किया है, किंतु इसके साथ ही इस विषय पर आत्ममंथन का एक अवसर भी उपस्थित किया है।

जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा है। जिस धर्म ने सूक्ष्मतम जीव की रक्षा का संदेश दिया, वह किसी पक्षी की हत्या का समर्थन कर ही नहीं सकता। दिगंबर जैन परंपरा में मयूरपिच्छी का उपयोग जीवों को बिना हिंसा हटाने के लिए किया जाता है, न कि किसी प्रदर्शन या वैभव के लिए। परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि मयूरपिच्छी केवल स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंखों से तैयार की जाती है।

किन्तु प्रश्न यह है कि क्या आज भी हर स्थान पर यही आदर्श स्थिति है? यदि कहीं भी इस पवित्र परंपरा के नाम पर अवैध व्यापार, शिकार या हिंसा का कोई तत्व जुड़ गया है तो उसे न केवल कानून के आधार पर, बल्कि जैन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर भी कठोरता से अस्वीकार किया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता केवल आरोपों का खंडन करने की नहीं, बल्कि समाज के सामने तथ्य रखने की है। यदि हमारे पास प्रमाण हैं कि मयूरपंख प्राकृतिक रूप से झड़े हुए ही लिए जाते हैं, तो उनका वैज्ञानिक और विधिक आधार पर प्रचार होना चाहिए। साथ ही यदि कहीं कोई अनियमितता है तो उसे छिपाने के बजाय समाप्त करने का साहस भी समाज को दिखाना चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में मोर राष्ट्रीय पक्षी है और उसके संरक्षण के लिए कठोर कानूनी प्रावधान हैं। इसलिए जैन समाज को वन विभाग, वन्यजीव विशेषज्ञों तथा पर्यावरणविदों के साथ संवाद स्थापित कर ऐसी पारदर्शी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिससे किसी प्रकार का भ्रम या विवाद उत्पन्न ही न हो।

आज सोशल मीडिया के युग में आधी-अधूरी जानकारी कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाती है। ऐसे समय में भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा तथ्यपरक उत्तर अधिक प्रभावी होते हैं। यदि कोई व्यक्ति या संस्था असत्य आरोप लगाती है, तो उसका विधिक और तार्किक उत्तर दिया जाना चाहिए; परंतु साथ ही हमें अपनी परंपराओं की शुचिता और पारदर्शिता भी सुनिश्चित करनी होगी।

यह विवाद केवल मयूरपंख का नहीं, बल्कि जैन धर्म की विश्वसनीयता और अहिंसा की वैश्विक छवि का भी है। इसलिए जैन समाज के सभी आचार्यों, मुनि-संघों, विद्वानों, सामाजिक संस्थाओं तथा वन्यजीव विशेषज्ञों को मिलकर एक स्पष्ट आचार-संहिता तैयार करनी चाहिए कि मयूरपिच्छी की प्राप्ति, निर्माण और उपयोग पूर्णतः अहिंसक एवं वैधानिक हो।

अंततः, जैन समाज का उत्तर केवल विरोध नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए जो संसार को यह विश्वास दिलाए कि अहिंसा केवल जैन धर्म का उपदेश नहीं, बल्कि उसका जीवन-दर्शन है। यदि हम इस अवसर को आत्मचिंतन, पारदर्शिता और सुधार का माध्यम बना लें, तो यह विवाद भविष्य में जैन समाज की नैतिक शक्ति को और अधिक सुदृढ़ करेगा।

— डॉ. अखिल बंसल

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments