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एक साथ उठे 3 इकलौते चिरागों के जनाजे… नर्मदा में डूब रहे थे तीन दोस्त, घरवालों का आरोप- नाविक मांगते रहे पैसे

मुहर्रम की छुट्टी के दिन नर्मदा नदी के दद्दा घाट पर नहाने गए तीन सगे दोस्तों की गहरे पानी में डूबने से मौत हो गई. इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि ये तीनों किशोर अपने-अपने गरीब माता-पिता की इकलौती संतान थे.

जबलपुर का मुजावर मोहल्ला है… यहां सन्नाटा तो था, लेकिन उस सन्नाटे को चीरती हुई चीखें कलेजे को छलनी कर रही थीं… सोहिल, साहिल और साबिर… ये वो तीन नाम हैं जो अब सिर्फ यादों में रह गए हैं…

16 से 18 साल की उम्र… जिंदगी की शुरुआत ही हुई थी… लेकिन नियति का क्रूर खेल देखिए, तीनों दोस्तों का जनाजा जब एक साथ मुजावर मोहल्ले से निकला, तो पत्थरों का दिल भी पिघल गया.

सूपाताल कब्रिस्तान में तीनों को एक ही जगह, एक साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया. ये तीनों लड़के अपने-अपने गरीब माता-पिता की इकलौती संतान थे. बुढ़ापे के जिन सहारों को माता-पिता ने खून-पसीने की कमाई से पाला था, वो आज मिट्टी में दफन हो गए.

हादसा नर्मदा के दद्दा घाट पर हुआ था. मुहर्रम की छुट्टी थी, 8 दोस्त बाइक से नहाने पहुंचे थे. खेलते-कूदते सोहिल का पैर गहरे पानी में चला गया. वो डूबने लगा… तड़पने लगा. दोस्ती का फर्ज निभाने के लिए साहिल और साबिर ने हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन मौत का वो भंवर इतना बेरहम था कि वो दोनों को भी अपने साथ गहरे पानी में खींच ले गया. मृतकों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें बचाने कोई नहीं आया…वहां मौजूद गोताखोर पैसे मांग रहे थे.

इस हादसे ने जितना गम दिया है, उससे कहीं ज्यादा आक्रोश परिजनों के आरोपों में है. आरोप है कि जब बच्चे जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे थे, तब घाट पर मौजूद नाव चालकों और गोताखोरों का दिल नहीं पसीजा. तमाशबीन बने नाविकों ने मदद के बदले पहले ‘चंद रुपयों’ की मांग की. बच्चों के दोस्त हाथ जोड़ते रहे, मिन्नतें करते रहे कि ‘पैसे बाद में ले लेना, पहले जान बचा लो…’ देखें VIDEO:-

अब इस पूरे मामले की जांच पुलिस की रही है. सीएसपी आशीष जैन का कहना है कि अगर आरोपों में सच्चाई हो तो उस पर कार्रवाई की जाएगी.

बहरहाल, जांच होगी, कानून अपना काम करेगा… लेकिन अगर आरोपों में सच्चाई है तो उन माताओं की सूनी गोद को कौन भरेगा? उन पिताओं के बुढ़ापे की लाठी को कौन लौटाएगा, जिनके इकलौते चिराग चंद रुपयों के लालच की भेंट चढ़ गए? अगर वक्त पर वो नाविक हाथ बढ़ा देते, तो शायद आज ये तीन घर तबाह होने से बच जाते.

जबलपुर की इस त्रासदी ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सचमुच हमारी संवेदनाएं और इंसानियत पैसों के आगे इतनी बौनी हो चुकी है?

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