अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल कैंपस से एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम की एक दिल दहला देने वाली और आंखें खोल देने वाली घटना सामने आई है, जिसे सुनकर कोई भी सेंसिटिव इंसान कांप जाएगा। एशिया के सबसे बड़े मेडिकल कैंपस में गरीब और जनरल कैटेगरी के किडनी पेशेंट्स के लिए जिंदगी और मौत का संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ फ्री डायलिसिस सिस्टम बंद हो रहा है, तो दूसरी तरफ उसी कैंपस के दो सरकारी हॉस्पिटल एक-दूसरे की रिपोर्ट मानने को तैयार नहीं हैं। यह अंदरूनी लड़ाई और सिस्टम में तालमेल की कमी गरीब पेशेंट्स की जिंदगी की उम्मीद को खत्म कर रही है।
आइए बात करते हैं चमन शर्मा नाम की 21 साल की बेटी की। जो अपनी मां के साथ किडनी ट्रांसप्लांट की बड़ी उम्मीद लेकर अहमदाबाद आई थी। रहने, खाने और किराए पर पैसे खर्च करने के बाद उसके पास सिर्फ 190 रुपये बचे थे। पहले दिन सिविल हॉस्पिटल ट्रॉमा सेंटर में उसके सभी टेस्ट फ्री हुए और रिपोर्ट भी आ गई। लेकिन टेक्नीशियन की गलती की वजह से वहां डायलिसिस नहीं हो सका। अगले दिन जब बेटी पास में ही मौजूद IKDRC हॉस्पिटल पहुंची, तो वहां के मेडिकल ऑफिसर ने सिविल रिपोर्ट लेने से साफ मना कर दिया और नई जांच करने को कहा!
सवाल यह उठता है कि जो रिपोर्ट खुद सिविल सरकारी डॉक्टरों ने तैयार की थी, जो सेंटर IKDRC के डायरेक्टर के अंडर आती है, वह IKDRC में इनवैलिड कैसे हो गई? इस अनाड़ी एडमिनिस्ट्रेशन से तंग आकर और पैसे की तंगी से परेशान होकर बेटी ने ट्रांसप्लांट का इरादा छोड़ दिया और आंखों में आंसू लिए वापस लौट आई। सरकारी सिस्टम की इससे बड़ी नाकामी और क्या हो सकती है?
दूसरी तरफ, गुजरात डायलिसिस प्रोग्राम यानी PMNDP स्कीम, जो आम और गरीब तबके के मरीजों के लिए लाइफलाइन है, IKDRC में बंद होने जा रही है। 9 जून, 2026 से डायलिसिस सर्विस में बड़े बदलाव करते हुए एक सर्कुलर जारी किया गया है। जिन मरीजों के पास BPL, PMJAY या SC-ST जैसे सरकारी कार्ड नहीं हैं, लेकिन वे असल में गरीब हैं, उन्हें अब फ्री डायलिसिस से मना कर दिया जाएगा। सिविल हॉस्पिटल में हर दिन 1000 से 1500 मरीज़ डायलिसिस करवाते हैं, जिनमें से 50 से 100 मरीज़ों के पास कोई कार्ड नहीं होता, लेकिन वे लाचार होते हैं।
किडनी डायलिसिस एंड ट्रांसप्लांट फाउंडेशन के महेश देवानी ने इस मामले में मुख्यमंत्री ऑफिस और हेल्थ डिपार्टमेंट को लेटर लिखकर तुरंत दखल देने की मांग की है। डायलिसिस कोई शौक या दूसरा इलाज नहीं है, यह मरीज़ को ज़िंदा रखने के लिए एक ज़रूरी सर्विस है। फाउंडेशन ने मांग की है कि जनरल कैटेगरी के मरीज़ों से पैसे लेने का फैसला तुरंत वापस लिया जाए, पुराना प्रोग्राम फिर से शुरू किया जाए और चमन शर्मा के मामले में ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ़ कड़ी जांच की जाए।
अब देखना यह है कि सेंसिटिव होने का दावा करने वाली सरकार इन गरीब मरीज़ों की मदद के लिए कब आएगी, या लालीवाड़ी में गरीब ऐसे ही मरते रहेंगे।

