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यह इंसाफ़ है या ड्रामा? अगर कानून बराबर है, तो उसे लागू करने में भेदभाव क्यों?

सुप्रीम कोर्ट की अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा को क्लीन चिट: क्या ‘गोली मारो…’ के नारे हिंसा भड़काने के लिए काफ़ी नहीं हैं?

नई दिल्ली : भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 29 अप्रैल 2026 का दिन कानूनी जानकारों और आम जनता के लिए चर्चा का विषय बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के एंटी-CAA आंदोलन के दौरान BJP नेता अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के विवादित भाषणों के मामले में FIR दर्ज करने से मना कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए जो तर्क दिए, उन्हें सुनकर आम नागरिक के मन में बस एक ही सवाल उठता है – यह इंसाफ़ है या सिर्फ़ टेक्निकल दिक्कतों का ड्रामा?

सुप्रीम कोर्ट का तर्क: हिंसा का कोई सीधा सबूत नहीं है!

कोर्ट ने साफ़ किया कि ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो…’ जैसे नारे किसी खास कम्युनिटी के खिलाफ़ नहीं थे और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं है जिससे पता चले कि इससे हिंसा भड़की हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि हेट स्पीच संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ़ है, लेकिन इस मामले में कानूनी कार्रवाई के लिए सबूतों की कमी है। इसके अलावा, उसने CrPC के सेक्शन 196 का हवाला दिया और कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ़ केस चलाने के लिए सरकार से पहले मंज़ूरी लेना ज़रूरी है।

‘पक्को गुजरात’ का सवाल: क्या आम नागरिक के लिए भी यही कानून है?

यहां सबसे बड़ा और ज़रूरी सवाल यह है कि अगर यही नारे किसी विपक्षी नेता या आम एक्टिविस्ट ने लगाए होते, तो क्या पुलिस इतनी नरमी दिखाती? क्या पुलिस तब भी FIR दर्ज करने के लिए ‘सीधे सबूत’ और ‘सरकार से पहले मंज़ूरी’ का इंतज़ार करती? इतिहास गवाह है कि कई एक्टिविस्ट को सिर्फ़ सोशल मीडिया पोस्ट या असहमति की आवाज़ उठाने के लिए UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत जेल भेजा गया है। तो फिर रूलिंग पार्टी के नेताओं के लिए इतनी कानूनी देखभाल क्यों? ज़हरीली भाषा: लोकतंत्र की नींव में एक कांटा
भले ही कोर्ट ने टेक्निकली इसे जुर्म न माना हो, लेकिन क्या परवेश वर्मा का ‘पूरा बॉयकॉट’ का आह्वान समाज को बांटने वाला नहीं है? क्या ऐसे शब्द समाज में डर और नफ़रत का माहौल नहीं बनाते? नफ़रत हमेशा तलवार लेकर नहीं आती, कभी-कभी यह धीरे-धीरे शब्दों के रूप में समाज के मन में घुस जाती है और फिर एक बड़ी त्रासदी का कारण बनती है।
लोकतंत्र की पतली लाइन
बोलने की आज़ादी यकीनन लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन जब इस आज़ादी का इस्तेमाल दूसरों के वजूद को नकारने या डराने के लिए किया जाता है, तो यह खतरनाक हो जाती है। अगर सत्ता की नज़र में हेट स्पीच कानून बदलते रहते हैं, तो न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कमज़ोर होता है। सिर्फ़ किताबों में कानून का बराबर होना ही काफ़ी नहीं है, उसका लागू होना भी बराबर होना चाहिए।

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