चेन्नई/विशेष संवाददाता : तमिलनाडु—वह धरती जहां की हवाओं में मंत्र गूंजते हैं, जहां देश के सबसे भव्य और सर्वाधिक मंदिर हैं, और जहां की 90% आबादी हिंदू धर्म में अटूट आस्था रखती है। लेकिन जब बात चुनावी नतीजों की आई, तो आंकड़ों ने सबको सन्न कर दिया। सवाल उठ रहा है कि जो भाजपा उत्तर भारत में ‘हिंदुत्व’ के दम पर विजय पताका फहराती है, वह मंदिरों की इस पावन भूमि पर एक अदद सीट के लिए क्यों तरस गई?
धर्म बनाम द्रविड़ अस्मिता: जहाँ ‘राम’ नहीं ‘पेरियार’ की विचारधारा भारी है
तमिलनाडु की राजनीति का मिजाज देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है। यहाँ का हिंदू अपनी आस्था को घर और मंदिरों तक सीमित रखता है, लेकिन जब वह वोट डालने जाता है, तो उसके जेहन में ‘धर्म’ से बड़ा ‘द्रविड़ गर्व’ और ‘तमिल पहचान’ होती है।
द्रविड़ आंदोलन की विरासत: दशकों से यहाँ की राजनीति पेरियार, अन्नादुरई और करुणानिधि की उस विचारधारा पर टिकी है जो ‘हिंदी थोपे जाने’ और ‘उत्तर भारतीय राजनीति’ के सख्त खिलाफ रही है।
क्षेत्रीय दल बनाम राष्ट्रीय दल: यहाँ की जनता को लगता है कि भाजपा एक ‘हिंदी भाषी बेल्ट’ की पार्टी है। डीएमके और एआईएडीएमके ने जनता के मन में यह बात गहरे तक उतार दी है कि उनके हितों की रक्षा केवल क्षेत्रीय दल ही कर सकते हैं।
मंदिरों का प्रदेश, पर विचारधारा का अवरोध
यह एक कड़वी हकीकत है कि तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मंदिर होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वहां भाजपा की जमीन तैयार है।
“तमिलनाडु का हिंदू शिव और विष्णु का भक्त तो है, लेकिन वह उस हिंदुत्ववादी राजनीति को स्वीकार करने को तैयार नहीं है जिसे वह ‘बाहरी’ मानता है।”
राजनीतिक विश्लेषक
भाजपा ने यहाँ अपनी पैठ बनाने के लिए ‘वेत्री वेल’ (मुरुगन की पूजा) और काशी-तमिल संगमम जैसे बड़े आयोजन किए, लेकिन नतीजे बताते हैं कि ये कोशिशें द्रविड़ किलों की दीवारों में दरार तक नहीं डाल पाईं।
घातक विश्लेषण: आखिर भाजपा कहां चूकी?
1 भाषाई दीवार: हिंदी को बढ़ावा देने की केंद्र की कोशिशों को तमिलनाडु में ‘सांस्कृतिक आक्रमण’ के रूप में देखा जाता है।
2 स्थानीय नेतृत्व का अभाव: अन्नामलाई जैसे कद्दावर नेताओं के बावजूद, भाजपा अभी भी यहाँ ‘मोदी के चेहरे’ पर निर्भर है, जबकि तमिल जनता अपने बीच के ‘मिट्टी के नेता’ को ढूंढती है।
3 गठबंधन का गणित: बिना किसी मजबूत क्षेत्रीय साथी के, भाजपा का अकेले लड़ना यहाँ ‘राजनीतिक आत्महत्या’ जैसा साबित हुआ है।
निष्कर्ष: भक्ति और वोट का अलग-अलग रास्ता
तमिलनाडु के नतीजों ने दिल्ली के बड़े रणनीतिकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सिर्फ मंदिरों और धर्म के सहारे दक्षिण का द्वार नहीं खोला जा सकता। यहाँ की सत्ता की चाबी धर्मग्रंथों में नहीं, बल्कि ‘तमिल भाषा, संस्कृति और द्रविड़ पहचान’ के बंद संदूकों में छिपी है।
महानगर मेट्रो का सवाल: क्या भाजपा कभी दक्षिण की इस ‘द्रविड़ दीवार’ को लांघ पाएगी, या तमिलनाडु हमेशा की तरह राष्ट्रीय पार्टियों के लिए एक अनसुलझी पहेली बना रहेगा?

