रोज़गार के लिए खड़े ठेले ‘अवैध’, लेकिन चुनावी रैलियों के लिए पूरा शहर जाम—किसके लिए है कानून?
ब्यूरो रिपोर्ट | अहमदाबाद : शहर की सड़कों पर एक कड़वी हकीकत बार-बार सामने आती है—जब गरीब अपना पेट पालने के लिए ठेला लगाता है, तो उसे ‘अतिक्रमण’ बताकर हटा दिया जाता है। लेकिन जब चुनावी मौसम आता है, तो वही सड़कें बड़े-बड़े जुलूसों और रैलियों के लिए घंटों बंद कर दी जाती हैं।
कानून का असली चेहरा या दोहरा मापदंड?
नगर निगम और प्रशासन अक्सर यह तर्क देते हैं कि सड़कें सार्वजनिक हैं और यातायात बाधित नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जब राजनीतिक रैलियों के कारण पूरा शहर थम जाता है, तब यही नियम कहां चले जाते हैं?
गरीब की रोज़ी बनाम राजनीति की ताकत:
एक रेहड़ी-पटरी वाला दिनभर मेहनत करके मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमाता है। उसके लिए सड़क सिर्फ जगह नहीं, बल्कि जीवन का सहारा है।
वहीं, राजनीतिक रैलियां शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रही हैं, जहां आम जनता की असुविधा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
चुनावी मौसम में ‘छूट’, बाकी समय में ‘सख्ती’:
विश्लेषण साफ बताता है कि नियमों का पालन परिस्थितियों के हिसाब से बदलता नजर आता है। चुनाव के दौरान प्रशासनिक सख्ती ढीली पड़ जाती है, जबकि आम दिनों में गरीबों पर कार्रवाई तेज हो जाती है।
समाज पर असर:
इस दोहरे रवैये से समाज में असंतोष बढ़ता है। गरीब तबका खुद को उपेक्षित महसूस करता है और उसके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास गहराता है।
जिम्मेदारी किसकी?
यह सिर्फ प्रशासन या राजनीति का सवाल नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही है। क्या हम ऐसा मॉडल नहीं बना सकते, जहां गरीबों की रोज़ी-रोटी भी सुरक्षित रहे और शहर का ट्रैफिक भी प्रभावित न हो?
समापन:
अगर व्यवस्था सिर्फ ताकतवरों के लिए झुके और कमजोरों पर सख्त हो, तो यह न्याय नहीं, बल्कि असंतुलन है।
याद रखना होगा—गरीब की आह अक्सर खामोश होती है, लेकिन उसका असर बहुत गहरा होता है।

