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सियासत का ‘महा-नरसंहार’: दिग्गज ढेर, गढ़ राख; गुजरात में विपक्ष का वजूद मिटा!

कहीं गद्दारी की सजा, कहीं रसूख का जनाजा; जनता के ‘प्रचंड प्रहार’ से हिली बड़े-बड़े सूरमाओं की सल्तनत

अहमदाबाद/सूरत। गुजरात स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में ऐसा ‘घातक’ भूचाल लाया है, जिसकी धमक वर्षों तक सुनाई देगी। यह चुनाव नहीं, बल्कि उन चेहरों के लिए ‘राजनीतिक कत्लगाह’ साबित हुआ है जो खुद को अजेय समझते थे। जनता ने अपने वोट की चोट से न सिर्फ सत्ता का समीकरण बदला, बल्कि कई बड़े दिग्गजों के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया है।

दिग्गजों का पतन: जब ‘नाम’ भी काम न आया

इस बार के नतीजों ने साबित कर दिया कि सियासत में कोई भी ‘अमर’ नहीं है। सूबे के कई ऐसे नामचीन चेहरे, जो राजनीति के शतरंज के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाते थे, आज धूल चाटते नजर आ रहे हैं:

वड़ोदरा का ‘धमाका’: कांग्रेस की कद्दावर नेता अमीबेन रावत की करारी हार ने पार्टी के आत्मविश्वास को लहूलुहान कर दिया है।

वर्दी का गुरूर टूटा: अरवल्ली के ओड में पूर्व IPS मनोज निनामा की हार यह बताने के लिए काफी है कि सत्ता का मैदान और पुलिस की धौंस दो अलग रास्ते हैं।

सूरत में ‘आप’ का सूपड़ा साफ: सूरत में मनोज सोरठिया और पायल साकरिया जैसे ‘पोस्टर बॉय’ अपनी साख तक नहीं बचा पाए। जिस सूरत को ‘आप’ अपना अभेद्य किला मानती थी, आज वहां सिर्फ भगवा सुनामी का मंजर है।

साख का संकट: लाठी तालुका पंचायत में लोक साहित्यकार मायाभाई अहीर की पुत्री की हार ने यह साफ कर दिया कि जनता अब ‘सेलेब्रिटी’ कार्ड के झांसे में आने वाली नहीं है।

गद्दारी पर ‘डेथ वारंट’: भूपत भायाणी की हार

भेसाण जिला पंचायत सीट से भूपत भायाणी की हार इस चुनाव का सबसे घातक संदेश है। पाला बदलकर जनता के जनादेश का अपमान करने वाले नेताओं को मतदाताओं ने घर का रास्ता दिखाकर स्पष्ट कर दिया है कि ‘जनता जनार्दन है, मोहरा नहीं’।

महानगर मेट्रो का तीखा विश्लेषण

ये नतीजे महज हार-जीत के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन सफेदपोशों के लिए चेतावनी की आखिरी घंटी है जो एसी कमरों में बैठकर अपनी जीत की पटकथा लिखते थे। सूरत की 120 में से 115 सीटें जीतकर भाजपा ने विपक्ष को आईसीयू (ICU) में भेज दिया है। कांग्रेस और आप के लिए यह हार नहीं, बल्कि राजनीतिक मृत्युदंड के समान है।

निष्कर्ष: अब सिर्फ ‘भगवा’ खौफ!

जब जनता खामोश होती है, तो उसका फैसला इसी तरह घातक होता है। अब सवाल यह है कि क्या धराशायी हुए ये दिग्गज इस मलबे से बाहर निकल पाएंगे, या फिर यह उनकी राजनीतिक पारी का अंतिम संस्कार है?

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