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लोकतंत्र का बड़ा सवाल : क्या ‘निर्विरोध’ सीट पर भी मिलना चाहिए NOTA का अधिकार?

विशेष लेख : कानून की पेचीदगियां और जनता की मांग

नई दिल्ली/अहमदाबाद | महानगर संवाददाता : लोकतंत्र में ‘मतदान’ सबसे बड़ा अधिकार है, लेकिन क्या होगा अगर आपके पास चुनने का विकल्प ही न बचे? हाल ही में गुजरात में 700 सीटों पर हुए निर्विरोध चुनावों ने एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह है कि यदि मैदान में केवल एक ही उम्मीदवार बचे और जनता उसे पसंद न करे, तो क्या वह NOTA (None of the Above) का बटन दबाने की मांग कर सकती है?

मौजूदा कानून क्या कहता है?

अक्सर जनता के मन में यह सवाल होता है कि एक उम्मीदवार होने पर भी वोटिंग क्यों नहीं होती? इसका जवाब हमारे कानून की किताबों में छिपा है:
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 53: यह कानून स्पष्ट करता है कि यदि नामांकन वापसी के बाद मैदान में केवल एक ही वैध उम्मीदवार बचता है, तो चुनाव अधिकारी (RO) उसे तुरंत ‘विजेता’ घोषित कर देता है।
वोटिंग का अभाव: जब उम्मीदवार एक ही हो, तो चुनाव कराने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं रहती। ऐसी स्थिति में वोटिंग की पूरी प्रक्रिया ही रद्द मान ली जाती है।

क्यों नहीं मिलता NOTA का विकल्प?

तकनीकी रूप से, NOTA कोई ‘जीवंत उम्मीदवार’ नहीं है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार:
1 EVM का गणित: बैलेट यूनिट या EVM मशीन का इस्तेमाल तभी होता है जब दो या दो से अधिक उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हो।
2 विकल्प बनाम वोट: चूंकि निर्विरोध की स्थिति में मुकाबला ही खत्म हो जाता है, इसलिए EVM मशीन लगाने और जनता को NOTA का विकल्प देने का प्रावधान वर्तमान नियमों में नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में उम्मीद की किरण

भले ही मौजूदा कानून निर्विरोध उम्मीदवार को सीधे विजेता मानता हो, लेकिन देश के कई जागरूक नागरिकों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिकाकर्ताओं की दलीलें बेहद ठोस हैं:

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