बड़ा सवाल : नफरत फैलाने वालों पर करोड़ों का खर्च और आम आदमी बेहाल
विशेष रिपोर्ट : लोकतंत्र में जनता को सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन क्या वाकई आज के दौर में यह अधिकार सुरक्षित है? हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक सजग नागरिक की जनहित याचिका (PIL) को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि RSS प्रमुख मोहन भागवत की Z+ सुरक्षा पर होने वाला करोड़ों का खर्च ‘जनता के पैसे की बर्बादी’ नहीं है। इस फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
न्यायपालिका की निष्पक्षता पर उठते सवाल
एक तरफ अदालतें सुरक्षा खर्च को जायज ठहरा रही हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर दिल्ली हाईकोर्ट की एक महिला जज का वीडियो वायरल है। इस वीडियो में जज महोदया RSS के कार्यक्रम में अपनी तरक्की का श्रेय उस संस्था को देती नजर आ रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग किसी विशेष विचारधारा के प्रति इतने नतमस्तक होंगे, तो क्या आम जनता को निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा?
Z+ सुरक्षा: जरूरत या राजनीतिक रसूख?
मोहन भागवत की सुरक्षा को अब प्रधानमंत्री के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया गया है। जनता यह पूछ रही है कि:
जो संगठन समाज में वैमनस्य और विभाजन की बातें करता है, उसके प्रमुख पर जनता की मेहनत की कमाई क्यों लुटाई जा रही है?
यदि उनके जीवन को इतना ही खतरा है, तो वे नागपुर मुख्यालय तक सीमित क्यों नहीं रहते?
एक ऐसा संगठन जिसका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा, उसके प्रमुख पर सरकारी खजाना खोलना कहाँ तक उचित है?
देश की कड़वी हकीकत बनाम वीआईपी कल्चर
एक तरफ देश का बुनियादी ढांचा चरमरा रहा है और दूसरी तरफ वीआईपी सुरक्षा पर अंधाधुंध खर्च हो रहा है। देश की वर्तमान स्थिति पर नजर डालिए:
1 80 करोड़ जनता मुफ्त अनाज पर निर्भर है।
2 युवाओं के पास रोजगार नहीं है, व्यापार शुरू करने के लिए पूंजी का अभाव है।
3 फंड की कमी के बहाने हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं।
4 महिलाओं और गरीबों को मिलने वाली मामूली सहायता राशि भी समय पर नहीं पहुंचती।
इतिहास के आइने में सच्चाई
इतिहास गवाह है कि जिस विचारधारा के रक्षक आज करोड़ों की सुरक्षा में घूम रहे हैं, उनके पूर्वजों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के बजाय उनका साथ दिया था। विनायक दामोदर सावरकर जैसे नेताओं ने छह बार अंग्रेजों से माफी मांगी और पेंशन पर गुजारा किया। आज उन्हीं की विचारधारा को आगे बढ़ाने वालों पर आम टैक्सपेयर का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।

