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गांधीनगर की सड़कों पर हुंकार: आखिर कौन है यह समुदाय जो मांग रहा है अपना हक? आरक्षण की आग ने फिर पकड़ी रफ़्तार!

ब्यूरो रिपोर्ट: महानगर मेट्रो : लोकेशन: गांधीनगर/अहमदाबाद : गांधीनगर : गुजरात की राजधानी गांधीनगर एक बार फिर बड़े आंदोलन का गवाह बनी है। हाल ही में हुए एक विशाल सम्मेलन ने राज्य सरकार की नींद उड़ा दी है। हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ और मंच से गूंजते नारों ने यह साफ कर दिया है कि पाटीदार (पटेल) समुदाय एक बार फिर अपने आरक्षण की मांग को लेकर लामबंद हो रहा है।

कौन है यह समुदाय और क्या है मांग?

यह आंदोलन मुख्य रूप से पाटीदार समाज (विशेषकर वे जो अभी भी ओबीसी कोटे से बाहर हैं) द्वारा किया जा रहा है। हालांकि, सम्मेलन में अन्य सवर्ण समुदायों के प्रतिनिधियों ने भी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

1 OBC का दर्जा: समुदाय की मांग है कि उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में शामिल किया जाए ताकि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का लाभ मिल सके।
2 EWS कोटे में विसंगतियां: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए जो 10% आरक्षण है, उसे समुदाय अपर्याप्त मान रहा है और इसमें सरलीकरण की मांग कर रहा है।
3 खेती और व्यापार में घाटा: समाज के नेताओं का तर्क है कि अब खेती और छोटे व्यापार से गुजारा मुश्किल है, इसलिए युवाओं को सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण अनिवार्य है।

क्यों उठी फिर से मांग?

सम्मेलन में वक्ताओं ने तीखे लहजे में कहा कि पिछले आंदोलनों के दौरान जो वादे किए गए थे, वे अब भी अधूरे हैं।

बेरोजगारी का दंश: उच्च शिक्षा के बावजूद समुदाय के युवा सरकारी भर्तियों से बाहर रह रहे हैं।
राजनीतिक दबाव: चुनाव के करीब आते ही समुदाय अपनी ताकत दिखाकर राजनीतिक दलों को अपनी मांगों पर झुकने को मजबूर करना चाहता है।
पुराने जख्म: साल 2015 के पाटीदार आंदोलन के दौरान हुए मुकदमों की वापसी और शहीदों के परिवारों को न्याय की मांग भी इस सम्मेलन का मुख्य हिस्सा रही।

महानगर मेट्रो का नजरिया: क्या झुकेगी सरकार?

गांधीनगर में हुआ यह शक्ति प्रदर्शन केवल एक भीड़ नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। गुजरात की राजनीति में पाटीदार समुदाय का वर्चस्व किसी से छिपा नहीं है।

महानगर मेट्रो सवाल उठाता है: क्या सरकार संवाद के जरिए इस समाधान को सुलझाएगी या एक बार फिर गुजरात 2015 जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है? आरक्षण की यह मांग सामाजिक न्याय की लड़ाई है या राजनीतिक वर्चस्व का खेल, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

महानगर मेट्रो विशेष कवरेज

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