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विशेष नमन : एक ‘अविद्या’ ने किए इतने अनर्थ, शिक्षा की लौ जलाकर फुले ने बदली थी भारत की तकदीर*

महानगर मेट्रो डेस्क,

“विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी।
नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया।
वित्त बिना शूद्र गये, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये।”

क्रांतिसूर्य महात्मा ज्योतिबा फुले की ये पंक्तियां आज भी समाज के लिए उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी 19वीं सदी में थीं। आज देश सामाजिक क्रांति के जनक, सत्यशोधक समाज के संस्थापक और नारी शिक्षा के अग्रदूत महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती मना रहा है। महानगर मेट्रो इस महामानव को कोटि-कोटि नमन करता है, जिन्होंने उस दौर में शिक्षा का बिगुल फूंका जब समाज अंधकार और कुरीतियों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।

शिक्षा के जरिए समानता की लड़ाई

ज्योतिबा फुले का मानना था कि समाज के सबसे निचले तबके की बदहाली का मुख्य कारण ‘शिक्षा का अभाव’ है। उन्होंने पहचान लिया था कि ज्ञान के बिना मनुष्य अपनी बुद्धि, अपनी नीति और अपनी आर्थिक शक्ति खो देता है। उन्होंने न केवल दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की बात की, बल्कि अपनी पत्नी माता सावित्रीबाई फुले को शिक्षित कर देश की पहली महिला शिक्षिका बनाया।

नारी शिक्षा के प्रथम स्तंभ

जब महिलाओं के लिए स्कूल जाने की कल्पना भी अपराध मानी जाती थी, तब 1848 में पुणे में फुले दंपति ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। समाज के विरोध और पत्थरों-गोबर की मार झेलकर भी उन्होंने शिक्षा की जो लौ जलाई, उसी का परिणाम है कि आज देश की बेटियां हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं।

सत्यशोधक समाज: पाखंड के विरुद्ध विद्रोह

24 सितंबर 1873 को ज्योतिबा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। उनका उद्देश्य समाज को जातिवाद, धार्मिक आडंबरों और शोषण से मुक्त करना था। उन्होंने ‘गुलामगिरी’ जैसी कालजयी पुस्तक लिखकर दुनिया को यह बताया कि मानसिक गुलामी सबसे खतरनाक होती है और इससे निकलने का एकमात्र रास्ता ‘विचारों की स्वतंत्रता’ है।
महानगर मेट्रो विशेष: क्यों याद रखना जरूरी है फुले के विचार?

समानता का संदेश:* उन्होंने कभी किसी वर्ग के प्रति नफरत नहीं, बल्कि हक और न्याय की बात की।
किसानों के मसीहा:* खेती-किसानी के संकट पर उन्होंने ‘किसान का कोड़ा’ (आसूड) लिखकर उनकी समस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाया।
मानवीय दृष्टिकोण:* अछूतों के लिए अपने घर का पानी का हौद खोल देना उस समय की सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना थी।

निष्कर्ष:

आज महानगर मेट्रो के माध्यम से हम समाज के हर वर्ग से अपील करते हैं कि महात्मा फुले की जयंती मनाना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके बताए शिक्षा और समानता के मार्ग पर चलेंगे। अविद्या के अंधकार को मिटाकर ही एक सशक्त और सुंदर समाज का निर्माण संभव है।
“इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए…”* – आइए, आज हम सब मिलकर इस अविद्या (अज्ञानता) को जड़ से मिटाने का संकल्प लें।

प्रस्तुति: महानगर मेट्रो न्यूज़ टीम*

शत-शत नमन!

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