Homeआर्टिकलविशेष संपादकीय : धर्मध्वजा पर प्रहार और डिजिटल 'हनीट्रैप' का घिनौना खेल

विशेष संपादकीय : धर्मध्वजा पर प्रहार और डिजिटल ‘हनीट्रैप’ का घिनौना खेल

पवन माकन (ग्रुप एडिटर) : नई दिल्ली/मुंबई : भारत की पावन धरती, जहाँ साधु-संतों का स्थान देवताओं के तुल्य माना गया है, आज वहां तकनीक का दुरुपयोग कर षड्यंत्र की काली स्याही फेंकी जा रही है। पिछले कुछ समय से जैन मुनियों को निशाना बनाकर जिस तरह से ‘डिजिटल हनीट्रैप’ और ‘डीप-फेक’ वीडियो का मायाजाल बुना जा रहा है, वह न केवल एक समाज के खिलाफ है, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना पर हमला है।

एडिटिंग का खेल और ब्लैकमेलिंग का संगठित गिरोह

यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अन्तर्राजीय गिरोह (Inter-state Gang) की साजिश प्रतीत होती है। इन गिरोहों का काम सीधा और घातक है:

  1. साधु-संतों की सादगी का फायदा उठाना।
  2. एडिटिंग टूल्स और AI तकनीक के जरिए फर्जी और अश्लील वीडियो तैयार करना।
  3. फिर उन वीडियो के दम पर करोड़ों की उगाही और ब्लैकमेलिंग करना।

यदि कोई उनके आगे नहीं झुकता, तो ये गिरोह सोशल मीडिया पर उन वीडियो को वायरल कर समाज में विद्वेष फैलाने का काम करते हैं। प्रश्न यह है कि क्या हमारी सुरक्षा एजेंसियां इन ‘डिजिटल आतंकवादियों’ से पीछे हैं?

मीडिया की गैर-जिम्मेदारी: टीआरपी की भूख या साजिश?

बेहद दुखद पहलू यह है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले कुछ न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स बिना किसी ‘फैक्ट चेक’ के इन फर्जी वीडियो को प्रसारित कर रहे हैं।

क्या सनसनी फैलाने की होड़ में पत्रकारिता की नैतिकता मर चुकी है?
बिना फॉरेंसिक जांच के किसी संत के चरित्र पर कीचड़ उछालना क्या अपराध नहीं है?
प्रेस काउंसिल और सूचना प्रसारण मंत्रालय को ऐसे चैनलों पर तत्काल नकेल कसनी चाहिए जो समाज में जहर घोलने का माध्यम बन रहे हैं।

सरकार और प्रशासन से सीधे सवाल
महानगर मेट्रो* सरकार से यह मांग करता है कि इस मामले में अब ‘प्रतीक्षा’ नहीं, ‘प्रहार’ की आवश्यकता है।
विशेष टास्क फोर्स (SIT):* इस अंतर्राजीय गिरोह को जड़ से उखाड़ने के लिए एक विशेष जांच दल का गठन हो।
कठोर कानून : भारतीय न्याय संहिता (BNS) और IT एक्ट के तहत ऐसी ब्लैकमेलिंग और चरित्र हनन के लिए ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ में सुनवाई हो।

सोशल मीडिया पर लगाम : भ्रामक पोस्ट डालने वाले अकाउंट्स को 24 घंटे के भीतर ब्लॉक करने और उनके संचालकों की गिरफ्तारी का प्रावधान कड़ा किया जाए।

निष्कर्ष: अब चुप रहना अपराध है*

जैन मुनि केवल एक समाज के नहीं, बल्कि त्याग और तपस्या के प्रतीक हैं। उनके विरुद्ध यह ‘डिजिटल युद्ध’ समाज को बांटने की कोशिश है। यदि आज इन अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में कोई भी सम्मानित व्यक्ति इन डिजिटल माफियाओं से सुरक्षित नहीं रहेगा।
सत्य की विजय अनिवार्य है, और षड्यंत्रकारियों का जेल जाना निश्चित!

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