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रिश्तों का गणित और नियति का न्याय: प्रेम अपेक्षा नहीं, ईश्वर का वरदान है

लेखक : पवन माकन (ग्रुप एडिटर, महानगर मेट्रो) : जीवन की राह पर चलते हुए हम अनगिनत व्यक्तियों से मिलते हैं। कभी कोई हमें पसंद आ जाता है, तो कभी हम किसी को पसंद आ जाते हैं। मानवीय स्वभाव के अनुसार, हम हमेशा यही चाहते हैं कि जिसके प्रति हमारे मन में भावनाएं हैं, उसकी ओर से भी हमें वैसा ही प्रेम मिले। परंतु, जीवन का एक कड़वा और शाश्वत सिद्धांत है: “यह आवश्यक नहीं कि आपको प्रेम वहीं से मिले, जहाँ से आप उसकी इच्छा रखते हैं।”
प्रेम सौदा नहीं, नियति है

हम अक्सर प्रेम को एक ‘लेन-देन’ या व्यवहार समझ लेते हैं—कि यदि मैंने किसी को इतना सम्मान या स्नेह दिया है, तो बदले में मुझे भी उतना ही मिलना चाहिए। लेकिन प्रेम कोई बाजारू सौदा नहीं है। प्रेम तो एक ऐसी अदृश्य डोर है जिसका नियंत्रण हमारे हाथों में नहीं, बल्कि ईश्वर के हाथों में है। जिसे हम ‘नियति’ कहते हैं, वह वास्तव में उस परमात्मा द्वारा हमारे लिए लिखी गई एक पटकथा है।

ईश्वर की रचना पर विश्वास

कभी-कभी हम जिसके पीछे पागल होते हैं, वह हमें नहीं मिलता और तब हम निराश हो जाते हैं। पर समय बीतने के साथ समझ आता है कि शायद वह व्यक्ति हमारे जीवन के विशाल कैनवास के लिए सही नहीं था। ईश्वर हमें वह नहीं देता जो हम ‘चाहते’ हैं, बल्कि वह देता है जिसकी हमें ‘जरूरत’ होती है।
प्रेम किस रूप में, कब और किस व्यक्ति के माध्यम से हमारे जीवन में प्रवेश करेगा, इसका निर्णय लेने का अधिकार केवल विधाता के पास है। हो सकता है कि आपको अपने जीवनसाथी में वह प्रेम न दिखे, लेकिन किसी मित्र, किसी संतान या किसी अनजान व्यक्ति की आत्मीयता में वह प्रेम मिल जाए।

संदेश

यदि आपको अपनी अपेक्षित जगह से प्रेम नहीं मिला है, तो उदास न हों। याद रखें कि आपकी नियति ईश्वर ने रची है और वह कभी चूक नहीं करता। बस अपने हृदय के द्वार खुले रखें, प्रेम किसी न किसी रूप में आपके पास निश्चित रूप से आएगा। क्योंकि प्रेम कोई मानवीय जिद नहीं, बल्कि एक दैवीय व्यवस्था है।
‘महानगर मेट्रो’ – समाचार के साथ संस्कारों का संगम।

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