Homeटॉप न्यूज़संपादकीय: धर्म की आड़ में अधर्म और न्याय का नग्न नृत्य

संपादकीय: धर्म की आड़ में अधर्म और न्याय का नग्न नृत्य

पवन माकन : बिहार के नालंदा जिले के अजयपुर गांव में २६ मार्च २०२६ की शाम जो हृदयविदारक घटना घटी, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। एक २० वर्षीय विवाहित महिला, जो दो-तीन बच्चों की माँ है, उसके साथ हुई अमानवीयता महज एक अपराध नहीं है, बल्कि हमारे तथाकथित सभ्य समाज के चेहरे पर लगा एक ऐसा कलंक है जिसे शायद ही कभी मिटाया जा सके।

कथित ‘संस्कृति रक्षकों’ की विकृति

इस घटना की जड़ में छिपी ‘मोरल पुलिसिंग’ (नैतिक पहरेदारी) की मानसिकता भयावह है। केवल एक संदेह के आधार पर—कि महिला किसी पुरुष के साथ देखी गई थी—तीन युवकों ने स्वयं को न्यायाधीश घोषित कर दिया और उसकी गरिमा को तार-तार करने का प्रयास किया। आश्चर्य और आघात की बात यह है कि इन आरोपियों ने गले में भगवा धारण कर रखा था।

भगवा त्याग और पवित्रता का प्रतीक है, लेकिन इन नराधमों ने इसका उपयोग अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को छिपाने और स्वयं को ‘धार्मिक’ सिद्ध करने के लिए किया। सत्य तो यह है कि धार्मिकता कपड़ों के रंग में नहीं, बल्कि स्त्री के प्रति सम्मान और आचरण की शुद्धता में होती है।

विकृत मानसिकता और सोशल मीडिया का दुरुपयोग

आरोपियों ने न केवल अत्याचार किया, बल्कि पूरी घटना का वीडियो बनाकर उसे वायरल भी कर दिया। यह ‘ट्रॉफी मेंटालिटी’ (विजय चिह्न मानसिकता) दर्शाती है कि अपराधियों के मन में कानून का कोई खौफ शेष नहीं रहा। उनके लिए एक स्त्री की अस्मत मात्र मनोरंजन का साधन बन गई है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह ‘मॉब मेंटालिटी’ (भीड़ की मानसिकता) और ‘सेक्सुअल एंटाइटेलमेंट’ का चरम है, जहां पुरुष स्वयं को स्त्री की नियति का स्वामी मान बैठता है।

२०१२ से २०२६: क्या बदला?

२०१२ के निर्भया कांड के समय पूरा देश सड़कों पर उतर आया था, लेकिन पिछले १२ वर्षों में हमने क्या हासिल किया? आज विडंबना यह है कि बलात्कारी पैरोल पर छूटते हैं, उनका सार्वजनिक सम्मान किया जाता है, और कई बार तो न्याय के नाम पर उन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है। जब बलात्कारियों के समर्थन में रैलियां निकलने लगें, तब आम आदमी न्याय की अपेक्षा किससे करे?

निष्कर्ष

नालंदा की यह घटना केवल बिहार की कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक पतन का जीवंत प्रमाण भी है। यदि अपराधियों को त्वरित और कठोर सजा नहीं मिली और समाज ने इन ‘गुंडा-तत्वों’ को संरक्षण देना बंद नहीं किया, तो हमें सुरक्षित होने का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।
याद रखिए, जब अन्याय के विरुद्ध मौन धारण किया जाता है, तो वह मौन भी अपराध में बराबर की भागीदारी माना जाता है।

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