विशेष प्रतिनिधि, महानगर मेट्रो : अहमदाबाद/नई दिल्ली: भारत की आजादी से लेकर आज तक के 79 वर्षों के इतिहास में देश की मुद्रा ‘रुपया’ ने कई ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। राजनीतिक मंचों से रुपए की मजबूती को लेकर किए गए बड़े-बड़े वादों और दावों के बीच, जब हम जमीनी आंकड़ों और आर्थिक गणित पर नज़र डालते हैं, तो एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। 1947 में डॉलर के मुकाबले सीना तानकर खड़ा रुपया आज 2026 में कहां खड़ा है? आइए समझते हैं इस आर्थिक पहेली को।
इतिहास के पन्ने: 1947 से 2014 का सफर
जब देश आज़ाद हुआ, तब 1 डॉलर की कीमत मात्र ₹3.30 के आसपास थी। वहां से लेकर वर्ष 2014 तक, यानी 67 वर्षों के लंबे शासनकाल में देश ने कई उतार-चढ़ाव और विभिन्न सरकारें देखीं।
- डॉ. मनमोहन सिंह का विदाई काल (2014): जब 2014 में यूपीए सरकार ने सत्ता छोड़ी, तब 1 डॉलर की कीमत ₹58.50 थी।
- 67 साल का लेखा-जोखा: इस लंबी अवधि में रुपए के मूल्य में डॉलर के मुकाबले कुल ₹55.20 की गिरावट (वृद्धि) हुई। अगर औसत निकालें, तो पिछली
सरकारों के शासन में डॉलर के मुकाबले रुपया प्रति वर्ष औसतन ₹1.14 कमजोर हुआ था।
मोदी शासन के 12 साल: क्या बदला?
26 मई 2014 को जब नरेंद्र मोदी ने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली, तब डॉलर का भाव ₹58.50 था। ‘अच्छे दिन’ और ‘रुपए को मजबूत करने’ के जोशीले वादों के साथ आई इस सरकार ने 12 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है।
- वर्तमान स्थिति (2026): आज 1 डॉलर की कीमत ऐतिहासिक निचले स्तर को छूते हुए लगभग ₹95.00 तक पहुंच गई है।
- 12 साल की गिरावट: मोदी सरकार के शासनकाल में रुपया डॉलर के मुकाबले ₹36.50 और टूट गया है।
आर्थिक विश्लेषण: गिरावट की गति तीन गुना तेज़?
महानगर मेट्रो ने जब दोनों कालखंडों की वार्षिक औसत गिरावट की तुलना की, तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं:
- पिछली सरकारें (67 वर्ष): प्रति वर्ष औसत गिरावट – ₹1.14
- मोदी सरकार (12 वर्ष): प्रति वर्ष औसत गिरावट (लगभग) – ₹3.04
यह आंकड़ा चौंकाने वाला है कि पिछली सरकारों के मुकाबले वर्तमान शासन में रुपए के अवमूल्यन (मूल्य में कमी) की गति लगभग तीन गुना तेज़ रही है।
वादे बनाम हकीकत: बाबा रामदेव का 35 का आंकड़ा
2014 के चुनाव प्रचार के दौरान, योग गुरु बाबा रामदेव जैसे समर्थकों ने जोर-शोर से दावा किया था कि यदि सत्ता परिवर्तन होता है, तो 1 डॉलर ₹35 में मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि सरकार ₹58.50 के स्तर को बनाए रखने में भी नाकाम रही। घटाने की बात तो बहुत दूर, रुपए में उल्टा ₹36.20 की भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
तुलनात्मक सारणी (आंकड़े जो सच बोलते हैं)
समय अवधि | शासनकाल | शुरुआती भाव (₹) | अंतिम भाव (लगभग ₹) | कुल गिरावट (₹) | वार्षिक औसत (₹) |
| 1947 – 2014 | अन्य सरकारें (67 वर्ष) | 3.30 | 58.50 | 55.20 | 1.14 |
| 2014 – 2026 | मोदी सरकार (12 वर्ष) | 58.50 | 95.00 | 36.50 | 3.04 |
निष्कर्ष: जनता की जेब पर सीधा प्रहार
डॉलर का महंगा होने का सीधा और कड़वा मतलब यह है कि देश में आयात होने वाली वस्तुएं (जैसे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल) महंगी हो जाती हैं। यह महंगाई अंततः देश की आम जनता की जेब पर प्रहार करती है। ’18-18 घंटे काम’ और ‘कड़े फैसले’ के दावों के बीच रुपए की यह रसातल में जाती स्थिति अर्थशास्त्रियों और आम आदमी के लिए गहरी चिंता का विषय है।
महानगर मेट्रो का सवाल: क्या रुपए की इस ऐतिहासिक गिरावट के लिए सिर्फ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, या हमारी आर्थिक नीतियों में कोई बड़ी खामी रह गई है?

