भीड़ जुटाने के लिए सरकारी खजाने पर ‘डाका’? 3000 बसों का काफिला और जनता की गाढ़ी कमाई का धुआं!
नई दिल्ली/ब्यूरो: पवन माकन (संस्थापक एवं समूह संपादक, धानी मीडिया)
विशेष रिपोर्ट: एक तरफ देश का आम नागरिक पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और महंगाई की कतारों में अपनी नियति को कोस रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का एक ऐसा खर्चीला खेल चल रहा है जिसे देखकर लोकतंत्र शर्मसार हो जाए। ताजा आंकड़ों और सूत्रों के हवाले से जो जानकारी सामने आई है, उसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है— क्या एक रिबन काटने और चंद मिनटों के भाषण के लिए जनता के टैक्स के पैसे को पानी की तरह बहाना जायज है?
सरकारी खजाने का धुआं: 2,00,000 लीटर डीजल का गणित
‘महानगर मेट्रो’ की पड़ताल के अनुसार, हाल ही में हुए भव्य उद्घाटन समारोह में भीड़ जुटाने के लिए लगभग 3000 सरकारी और निजी बसों को तैनात किया गया था। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन बसों को अलग-अलग जिलों से लाने और ले जाने में लगभग 2 लाख लीटर डीजल फूंक दिया गया।
- सवाल यह है: जब देश का किसान एक-एक बूंद डीजल के लिए तरस रहा है, तब महज ‘शक्ति प्रदर्शन’ के लिए इस तरह की बर्बादी किसके आदेश पर हुई?
- खर्च का बोझ: इस ईंधन की कीमत करोड़ों में है, जिसका सीधा बोझ अंततः आम आदमी की जेब पर ही पड़ेगा।
भीड़ का ‘इन्वेंटरी मैनेजमेंट’: विकास या विज्ञापन?
रिपोर्ट बताती है कि उद्घाटन स्थल पर जो हजारों की भीड़ दिखाई दी, वह स्वतः स्फूर्त नहीं बल्कि ‘मैनेज्ड’ थी। सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर ग्राम पंचायतों और ब्लॉक स्तर से लोगों को बसों में भरकर लाया गया।
- परेशान जनता: जिन बसों को स्कूल और सार्वजनिक परिवहन के लिए होना चाहिए था, उन्हें राजनीतिक रैलियों के लिए मोड़ दिया गया। नतीजतन, बीमार मरीज, छात्र और कामकाजी लोग घंटों कतारों में फंसे रहे।
- महंगा इवेंट: टेंट, लाइट, साउंड और विज्ञापनों पर हुआ खर्च अलग है। क्या यह पैसा “विकास” के लिए है या किसी एक व्यक्ति की छवि को चमकाने के लिए?
विपक्ष और जनता का सीधा प्रहार: “यह पैसा किसके बाप का है?”
सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक अब यह सवाल गूंजने लगा है। जनता पूछ रही है कि जब शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट पर कैंची चलाई जाती है, तब इन शाही उद्घाटनों के लिए करोड़ों रुपये कहाँ से आते हैं?
- आम आदमी की पीड़ा: एक दिहाड़ी मजदूर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमें राशन की लाइन में खड़ा किया जाता है और साहब के इवेंट के लिए बसें मुफ्त में दौड़ती हैं। यह पैसा हमारे खून-पसीने के टैक्स का है।”
महानगर मेट्रो का सीधा प्रहार:
यह रिपोर्ट किसी विचारधारा के खिलाफ नहीं, बल्कि वित्तीय जवाबदेही (Financial Accountability) के पक्ष में है। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री ‘प्रधान सेवक’ होता है, ‘प्रधान इवेंट मैनेजर’ नहीं।
- क्या सीएजी (CAG) इन उद्घाटनों पर होने वाले फिजूलखर्च की ऑडिट करेगी?
- क्या रिबन काटने की रस्म को सादगी से नहीं निभाया जा सकता था?
- सरकारी बसों का राजनीतिक इस्तेमाल करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
सम्पादकीय निष्कर्ष:
अगर सत्ता इसी तरह जनता के पैसे को अपनी ब्रांडिंग में फूंकती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब खजाना खाली होगा और जनता के हाथ में केवल ‘डिजिटल इंडिया’ का खाली कटोरा रह जाएगा। प्रशासन को जवाब देना होगा कि आखिर यह ‘डीजल पॉलिटिक्स’ कब रुकेगी?
ब्यूरो रिपोर्ट, महानगर मेट्रो

