वडोदरा। गुजरात की राजनीति में ‘कार्यकर्ता आधारित पार्टी’ का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए वडोदरा स्थानीय निकाय चुनाव का टिकट बंटवारा इस बार बड़ा चर्चा का विषय बन गया है। पार्टी की जारी सूची ने यह साफ संकेत दिया है कि संगठन के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं से ज्यादा चर्चा ‘नेताओं के घरानों’ को मिले महत्व की हो रही है। वडोदरा नगर निगम चुनाव के लिए भाजपा ने 76 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, जिसमें केवल 15 पुराने चेहरों को दोबारा मौका मिला है, जबकि बाकी नए नाम शामिल किए गए हैं।
कुर्सी पर ‘वारिसों’ का कब्ज़ा: 8 करीबियों को मिला मौका
टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर परिवारवाद की चर्चा तेज हो गई है। स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि कई प्रभावशाली पूर्व विधायकों, पूर्व पार्षदों और रसूखदार नेताओं के बेटे, बेटियों और बहुओं को प्राथमिकता दी गई है। दिग्गजों के उत्तराधिकारी: पूर्व विधायकों और रसूखदार पूर्व पार्षदों के बेटे, बेटियों और बहुओं को चुनावी रण में उतारा गया है।
8 खास चेहरे: कुल उम्मीदवारों में से लगभग 8 ऐसे नाम बताए जा रहे हैं, जिनका सीधा संबंध पार्टी के प्रभावशाली परिवारों से माना जा रहा है।
कार्यकर्ताओं की उपेक्षा: वर्षों से झंडा उठाने वाले और जमीनी स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की तुलना में राजनीतिक वारिसों को तरजीह मिलने की चर्चा संगठन के भीतर असंतोष बढ़ा रही है।
महानगर मेट्रो का सवाल: क्या खत्म हो गई आंतरिक लोकतंत्र की परंपरा?
भाजपा हमेशा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती रही है, लेकिन वडोदरा की यह तस्वीर कई सवाल खड़े कर रही है।
- क्या भाजपा में अब योग्यता से ज्यादा ‘सरनेम’ की कीमत बढ़ गई है?
- क्या आम कार्यकर्ता केवल बड़े नेताओं के बच्चों की जीत सुनिश्चित करने तक सीमित हो गया है?
- क्या पूर्व दिग्गजों का यह दबदबा पार्टी के भीतर असंतोष की चिंगारी को हवा देगा?
अंदरूनी कलह की आशंका: नाराज़ कार्यकर्ताओं का क्या?
सूत्रों के अनुसार टिकट बंटवारे के बाद कई वॉर्डों में स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर सुनाई देने लगे हैं। कुछ जगहों पर असंतोष इतना बढ़ा कि नामांकन के अंतिम दिन तक बगावती तेवर देखने को मिले। हाल ही में वडोदरा में एक भाजपा उम्मीदवार का नाम वोटर लिस्ट में न मिलने से अंतिम समय पर बदलाव भी करना पड़ा, जिसने अंदरूनी प्रबंधन पर सवाल खड़े किए। वडोदरा की जनता अब यह देख रही है कि उसे ‘काम’ के आधार पर वोट देना है या ‘खानदान’ के आधार पर। भाजपा का यह ‘परिवार प्रेम’ उसे सत्ता तक ले जाएगा या अपनों की नाराज़गी भारी पड़ेगी, इसका फैसला अब 26 अप्रैल के मतदान और 28 अप्रैल की मतगणना में सामने आएगा।

