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चुनावी ‘रेवड़ी’ या अर्थव्यवस्था की बर्बादी? जनता पूछ रही है—’साहब, पैसा आएगा कहाँ से?’

अहमदाबाद : देश की राजनीति में इन दिनों ‘मुफ्त’ योजनाओं की बाढ़ सी आ गई है। कहीं महिलाओं के खाते में सीधे 10,000 रुपये भेजने का वादा किया जा रहा है, तो कहीं छात्राओं को मुफ्त स्कूटी देने जैसे लुभावने ऑफर सामने रखे जा रहे हैं। लेकिन इस चुनावी चमक-धमक के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जिसे खास तौर पर आत्मनिर्भरता में विश्वास रखने वाला गुजराती समाज पुरजोर तरीके से उठा रहा है।

हमें मुफ्त की ‘रेवड़ी’ नहीं, ठोस नीति चाहिए!

गुजरात के मेहनतकश नागरिकों और जागरूक करदाताओं का स्पष्ट मानना है कि सरकारें जो ‘मुफ्त’ बांटने का दावा करती हैं, वह पैसा उनका अपना नहीं, बल्कि आम जनता की जेब से टैक्स के रूप में वसूला गया धन है। जनता का सवाल सीधा है:

“हमें मुफ्त की रेवड़ी नहीं चाहिए। हमें ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर और माहौल चाहिए जहाँ हम खुद कमा सकें। सरकारें कर्ज लेकर खैरात बांट रही हैं, जिसका बोझ अंततः आने वाली पीढ़ियों पर ही पड़ेगा।”

बजट का गणित: दावे हजार, तिजोरी खाली?

राजनीतिक दल चुनावों के दौरान जो बड़े-बड़े वादे करते हैं, उनकी जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े करती है।

बिहार का उदाहरण: अगर हर महिला के खाते में 10,000 रुपये डाले जाएं, तो राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल इसी योजना में खत्म हो सकता है।
स्कूटी और गैजेट्स: मुफ्त स्कूटी जैसे वादे सुनने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन क्या राज्यों के पास इतना सरप्लस बजट है, या फिर यह और अधिक कर्ज लेने की तैयारी है?

महानगर मेट्रो का कड़ा विश्लेषण: कर्ज में डूबा भविष्य

आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि कई राज्य पहले से ही लाखों करोड़ के कर्ज में दबे हुए हैं। ऐसे में मुफ्त योजनाओं के लिए पैसा कहाँ से आएगा? इसके केवल तीन ही रास्ते बचते हैं—

  1. महंगाई की मार: पेट्रोल, डीजल और जरूरी चीजों पर टैक्स बढ़ाना।
  2. कर्ज का जाल: विकास कार्यों को रोककर भारी ब्याज पर कर्ज लेना।
  3. बुनियादी ढांचा ठप्प: स्कूल, अस्पताल और सड़कों के रखरखाव के बजट में कटौती करना।

जनता का फैसला: स्वाभिमान बनाम मुफ्तखोरी

आज का जागरूक नागरिक समझ चुका है कि ‘मुफ्त’ कुछ भी नहीं होता। जब कोई पार्टी मुफ्त बिजली या नकद राशि का वादा करती है, तो वह असल में जनता के विकास के अवसर छीन रही होती है।

महानगर मेट्रो का सवाल यह है कि क्या चुनाव जीतने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाना सही है? क्या मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकारी तिजोरी का इस्तेमाल किसी ‘रिश्वत’ की तरह नहीं किया जा रहा?

आपका क्या मानना है? क्या विकास के बदले मुफ्त योजनाओं का यह मॉडल देश को श्रीलंका जैसी आर्थिक बदहाली की ओर ले जा रहा है? अपनी राय हमें लिखें।

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