साल 1848 में जब क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने देश में महिला शिक्षा की नींव रखी और पहला लड़कियों का स्कूल शुरू किया, तो उस समय के कट्टरपंथी और मानवतावादी विचारों वाले लोग उन पर गोबर और कीचड़ फेंकते थे। सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी रखती थीं, और स्कूल में साड़ी बदलने के बाद भी, उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाने का पवित्र काम जारी रखा। आज समय बदल गया है, सदियाँ बदल गई हैं, लेकिन अपनी सच्ची आवाज़ उठाने वालों के प्रति ज़ुल्म करने वालों और कट्टर मानसिकता वाले लोगों का बिगड़ा हुआ रवैया बिल्कुल नहीं बदला है। जो लोग कल गोबर फेंकते थे, आज उनके मानसिक वारिस विरोध की आवाज़ दबाने के लिए स्याही फेंक रहे हैं! हाल ही में, जब जंतर-मंतर प्रोटेस्ट फेम नेहा बोरा पेपर लीक और परीक्षाओं में गंभीर गड़बड़ियों के खिलाफ स्टूडेंट्स के हक और इंसाफ के लिए आवाज उठाने झारखंड पहुंचीं, तो उन पर स्याही फेंककर उनकी आवाज दबाने की कायरतापूर्ण कोशिश की गई।
स्याही लिखने और सवाल पूछने के लिए होती है, फेंकने के लिए नहीं!
इस कायरतापूर्ण हरकत को करने वाले असामाजिक तत्वों और गुंडों को पता होना चाहिए कि स्याही देश के संविधान, शिक्षा और क्रांति का इतिहास लिखने का एक टूल है, न कि किसी मासूम और संघर्षरत महिला पर फेंकने का हथियार। स्याही फेंककर आप सच और इंसाफ के लिए लड़ने वालों को कभी नहीं डरा पाएंगे।
कोई आवाज नहीं दबेगी: चाहे नेहा सिंह राठौर हों या नेहा बोरा—जब देश की बेटियां और युवा सड़कों पर उतरकर देश के भविष्य और एजुकेशन सिस्टम के बारे में सवाल पूछते हैं, तो उनकी आंखों में सच की चमक होती है। डर की राजनीति का अंत: स्याही के दाग तो कपड़ों से धुल जाएंगे, लेकिन आंदोलनकारियों पर कायरतापूर्ण हमला करने वालों के चेहरों से लोकतंत्र विरोधी होने का काला दाग कभी नहीं मिटेगा।
समाज के लिए एक साफ संदेश
यह देश विचारों और संविधान से चलता है, गुंडों या गैंगस्टरों की तानाशाही से नहीं। जब कोई महिला या युवक पेपर लीक माफिया और युवाओं के भविष्य से खेलने वाले भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे डराने या बेइज्जत करने की कोशिशें इस बात का सबूत हैं कि अधिकारी और सिस्टम उसकी सच्चाई से डरते हैं।
आज समाज को भी जागने और यह समझने की जरूरत है कि देश के पढ़े-लिखे युवाओं और महिलाओं पर हमला करने वाले असल में क्रांति और तरक्की के विरोधी हैं। ऐसी कायरतापूर्ण घटनाएं क्रांति की मशाल को बुझाती नहीं, बल्कि उसे और भड़काती हैं!

