केंद्रीय कैबिनेट ने देश के लाखों स्टूडेंट्स के भविष्य से जुड़े NEET एग्जाम कानून में बदलाव करके उसे और ‘सख्त’ बनाने का फ़ैसला किया है। नई रिसर्च के मुताबिक, अपराधियों के लिए जेल की सज़ा और जुर्माने की रकम में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी की गई है। कागज़ों पर तो यह बदलाव बहुत तारीफ़ के काबिल और सख़्त लगता है, लेकिन असलियत यह है कि देश की युवा पीढ़ी यानी ‘Gen Z’ (Gen Z) सरकार के इस फ़ैसले से बिल्कुल भी खुश नहीं है।
सरकार युवाओं की सोच को समझने में नाकाम रही है: ‘लागू करने’ की नहीं, ‘ज़रूरत’ है!
सरकार शायद आज की नई पीढ़ी की सोच और गुस्से को अभी तक पहचान नहीं पाई है। देश के पढ़े-लिखे युवा सिर्फ़ कागज़ों पर नए कानून या बदलाव नहीं चाहते, बल्कि वे अपने बनाए कानूनों का ‘सख्त और सही तरीके से लागू होना’ चाहते हैं। देश में जब भी कोई पेपर लीक या स्कैम सामने आता है, तो सरकार छोटी मछलियों, एजेंट्स या आम सेंटर मैनेजर्स को पकड़कर केस बंद कर देती है। लेकिन करोड़ों का बिजनेस चलाने वाले मेन मास्टरमाइंड्स और ‘बड़े हेड्स’ पर सख्त एक्शन कब होगा? यही वो ज्वलंत सवाल है जो युवा पूछ रहे हैं।
आंदोलन को बेरहमी से दबाने की कोशिश: सरकार की बड़ी पॉलिटिकल गलती
सरकार ने अपने भविष्य और इंसाफ के लिए आवाज उठा रहे स्टूडेंट्स के आंदोलन को बेरहमी से कुचलने की कोशिश की, जो सिस्टम की सबसे बड़ी गलती साबित हुई है। जंतर-मंतर या दिल्ली की सड़कों पर शुरू हुआ स्टूडेंट्स का यह शांतिपूर्ण आंदोलन अब सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रहा। सरकार के दबाने वाले रवैये के कारण यह गुस्सा अब देश के कोने-कोने और लगभग हर राज्य में आग की तरह फैल चुका है।
अगर युवाओं का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो आने वाले समय में एक बड़ा विद्रोह तय है!
Gen Z अब खोखले भरोसे से संतुष्ट होने को तैयार नहीं है। अगर सरकार समय रहते नहीं जागी और पेपर लीक माफिया, भ्रष्ट अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े मालिकों के खिलाफ बुलडोजर जैसी सख्त कार्रवाई नहीं की, तो यह आंदोलन और उग्र होगा। जब देश का युवा सड़कों पर उतरेगा, तो बड़े अधिकारियों के सिंहासन हिल जाएंगे। अब देखना यह है कि सरकार इस युवा के गुस्से को समझकर असली न्याय देती है या सिर्फ कानूनी कागज दिखाकर टाइम पास करती है!

