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TRP गेम ज़ोन आग: 27 जानें गईं और चीफ़ फ़ायर ऑफ़िसर इलेश खेर को हाई कोर्ट से राहत मिली!

हाई कोर्ट ने सस्पेंड करने का आदेश दिया, निकालने का नहीं; आग पीड़ित परिवारों में बहस और गुस्से के बीच कानूनी मोड़!

राजकोट / अहमदाबाद : राजकोट में हुए TRP गेम ज़ोन आग हादसे में एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है, जिसने पूरे गुजरात को हिलाकर रख दिया था और 27 बेगुनाह लोगों को ज़िंदा जला दिया था। इस भयानक आग हादसे के बाद, राजकोट के उस समय के चीफ़ फ़ायर ऑफ़िसर (CFO) इलेश खेर, जिन्हें कार्रवाई के तहत नौकरी से निकाल दिया गया था, उन्हें गुजरात हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि इलेश खेर को निकालने के बजाय सस्पेंड माना जाए।

क्या है हाई कोर्ट का आदेश और कानूनी मोड़?

TRP गेम ज़ोन हादसे के बाद राजकोट म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (RMC) ने चीफ़ फ़ायर ऑफ़िसर इलेश खेर के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की और उन्हें सीधे नौकरी से निकाल दिया। इलेश खेर ने इस फैसले के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

बिना मंज़ूरी के कार्रवाई पर सवाल: हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि नियमों के मुताबिक एक खास प्रोसेस और फाइनल अप्रूवल के बिना सीधे नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।

हाई कोर्ट का आदेश: हाई कोर्ट ने टेक्निकल और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इलेश खेर के नौकरी से निकालने के आदेश पर रोक लगा दी है और आदेश दिया है कि उन्हें नौकरी से निकालने के बजाय ‘सस्पेंड’ माना जाए।

27 बेगुनाहों की मौत का ज़िम्मेदार कौन है? जनता के बीच तीखे सवाल उठे हैं!

जहां गेमिंग ज़ोन में NOC, फायर सेफ्टी इक्विपमेंट और गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन पर आंखें मूंद लेने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, वहीं हाई कोर्ट के इस राहत आदेश ने आग के पीड़ितों के परिवारों और आम जनता के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

“क्या उस आग के मुख्य गुनहगार, जिसमें 27 बेगुनाह जिंदगियां राख हो गईं, राहत पाने के लिए कानूनी कमियों का फायदा उठा रहे हैं?” प्रशासन के काले कारनामों के खिलाफ महानगर मेट्रो न्यूज़ का सीधा हमला

राजकोट गेम ज़ोन में लगी आग सिर्फ़ एक हादसा नहीं थी, बल्कि सरकारी अधिकारियों और गेम ज़ोन चलाने वालों की मिलीभगत का नतीजा थी।
हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद सबकी नज़रें इस बात पर हैं कि राजकोट म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और राज्य सरकार आगे क्या रुख अपनाती है। क्या प्रशासन इस आदेश के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेगा या फिर 27 जिगर के टुकड़ों को खोने वाले पीड़ितों के परिवारों को न्याय के लिए और लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा?

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