सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के पास सबसे ज़बरदस्त हथियार है, क्या वे गडकरी के इस्तीफ़े की मांग करेंगे?
नई दिल्ली। देश में नीट पेपर लीक घोटाले का हंगामा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि राजनीतिक गलियारों और गाड़ी चलाने वालों के बीच एक नया और बड़ा मुद्दा खड़ा हो गया है – ई-20, यानी पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल की मिलावट! राजनीतिक जानकारों की मानें तो अगर विपक्ष इस मुद्दे को सही ढंग से उठाता है, तो यह केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की कुर्सी हिला सकता है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो सत्ता-विपक्ष, जाति या धर्म से ऊपर है और सीधे देश के हर आम नागरिक की जेब और उनकी गाड़ियों से जुड़ा है।
क्या है ई-20 विवाद और यह आम लोगों के लिए मुसीबत क्यों बन गया?
केंद्र सरकार ने प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल का आयात घटाने के नाम पर ईंधन में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने की नीति तेज़ी से लागू की है। लेकिन इस नीति का सीधा असर आम गाड़ी मालिकों पर पड़ रहा है:
- इंजन खराब होने का डर: पुरानी गाड़ियों के इंजन ई-20 ईंधन के हिसाब से नहीं बने हैं। ऐसी शिकायतें आम हो गई हैं कि इथेनॉल की वजह से इंजन के पार्ट्स, रबर पाइप और फ्यूल पंप तेज़ी से खराब हो रहे हैं।
- माइलेज में भारी कमी: पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल की कैलोरीफ़िक वैल्यू (ऊर्जा क्षमता) कम होती है, जिससे गाड़ियों का माइलेज 10 से 15 प्रतिशत तक कम हो गया है। यानी जनता पेट्रोल की पूरी कीमत तो देती है, लेकिन उन्हें माइलेज कम मिलता है।
- जेब पर दोहरी मार: एक तरफ पेट्रोल की कीमतें कम नहीं हो रही हैं, और दूसरी तरफ इथेनॉल वाले पेट्रोल की वजह से गाड़ियों के रखरखाव और पेट्रोल की खपत बढ़ गई है।
विपक्ष के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है यह मुद्दा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब तक विपक्ष ऐसे मुद्दे उठाता रहा है जो किसी खास वर्ग तक ही सीमित थे। लेकिन E20 एक ऐसा मुद्दा है जो देश के 40 करोड़ से ज़्यादा गाड़ी मालिकों पर सीधा असर डालता है।
अगर विपक्ष इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाता है और तथ्यों के साथ जनता के बीच जाता है, तो सरकार के लिए इस मुद्दे पर अपना बचाव करना बहुत मुश्किल हो सकता है। युवा नीट पेपर लीक से नाराज़ हैं, और देश का मध्यम वर्ग ई-20 से परेशान है। अगर ये दोनों मुद्दे एक साथ आ जाएं, तो सरकार पर बहुत दबाव पड़ सकता है।
ऐसा मुद्दा जिस पर समर्थक भी चुप हो जाते हैं!
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो लोग सोशल मीडिया पर सरकार के हर फैसले का आँख बंद करके समर्थन करते रहे हैं, वे भी जब गैरेज में अपनी बाइक या कार की सर्विस करवाते हैं और हज़ारों रुपये का बिल देखते हैं, तो ई-20 के खिलाफ आवाज़ उठाने को मजबूर हो जाते हैं। यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक भी इस पॉलिसी से परेशान दिखते हैं जब उनकी कार का इंजन खराब हो जाता है या उनकी जेब से ज़्यादा पैसे खर्च होते हैं।
क्या नितिन गडकरी को निशाना बनाया जाएगा?
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी फ्लेक्स-फ्यूल और इथेनॉल ब्लेंडिंग की वकालत करते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से बिना सही टेस्टिंग, पुरानी गाड़ियों के लिए सुरक्षा उपायों और ग्राहकों को कोई विकल्प दिए बिना पूरे देश में ई-20 लागू किया गया, उसका सीधा दोष उनके मंत्रालय और पॉलिसी पर जाता है।
अब यह देखना बाकी है कि क्या विपक्ष संसद से लेकर सड़कों तक जनता से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे को उठाकर सरकार को बैकफुट पर ला पाएगा, या आम लोग इसी तरह अपनी जेब खाली करते रहेंगे?

