स्पेशल रिपोर्ट : “जब अन्याय हद पार कर जाता है, तो शब्द और हथियार कम पड़ जाते हैं… और तब ‘अहिंसक उपवास’ का ऐसा घातक हथियार पैदा होता है, जिसकी ताकत के आगे दुनिया की बड़ी-बड़ी सल्तनतें भी घुटने टेक देती हैं!”
चाहे सोनम वांगचुक हों, जो अपनी संस्कृति, ज़मीन और भविष्य की रक्षा के लिए लद्दाख के माइनस डिग्री तापमान में 21 दिन के आमरण अनशन पर बैठे थे, या वे महानुभाव जिन्होंने आज़ाद भारत का नया नक्शा बनाया—भारत के इतिहास में भूख हड़ताल सिर्फ़ पेट खाली रखने का उपवास नहीं रही है, बल्कि शासकों के अहंकार को चकनाचूर करने वाली क्रांति साबित हुई है।
आज ‘महानगर मेट्रो ‘ आपको भारत की ऐतिहासिक भूख हड़तालों के बारे में बताएगा, जिन्होंने देश की किस्मत और नक्शा दोनों बदल दिए।
- भगत सिंह और उनके साथी: लाहौर जेल में 116 दिन की सज़ा
ब्रिटिश सरकार जेल की सलाखों के पीछे भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव करती थी। अंग्रेजों के इस अमानवीय अत्याचार के खिलाफ, क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने 1929 में लाहौर जेल में भूख हड़ताल का हथियार उठाया।
ब्रिटिश सरकार ने हड़ताल तोड़ने के लिए कैदियों की नाक से दूध ज़बरदस्ती निकालने की बेरहम कोशिशें कीं, लेकिन इन आज़ादी के दीवानों ने हार नहीं मानी। इसी भूख हड़ताल के दौरान, 63 दिन की लड़ाई के बाद क्रांतिकारी जतिन दास शहीद हो गए। इस भूख हड़ताल ने पूरे देश में क्रांति का ऐसा बवंडर मचाया कि ब्रिटिश राज की नींव हिल गई।
- पोट्टी श्रीरामुलु: 56 दिन खाना न खाने के बाद बदल गया भारत का नक्शा!
आज़ादी के बाद सबसे बड़ा ऐतिहासिक बदलाव आंध्र प्रदेश राज्य का बनना था। 2 अक्टूबर 1952 को महात्मा गांधी के मानने वाले पोट्टी श्रीरामुलु ने अलग तेलुगु भाषी राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। 56 दिनों तक खाना-पानी न खाने के बाद पोट्टी श्रीरामुलु ने अपनी जान दे दी। उनके बलिदान के बाद पूरे दक्षिण भारत में ऐसी हिंसक क्रांति हुई कि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को झुकना पड़ा। इसी भूख हड़ताल की वजह से ‘स्टेट्स रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट’ बना और भाषा के आधार पर पूरे भारत का नक्शा फिर से बनाना पड़ा!
- महात्मा गांधी और अहमदाबाद मिल मज़दूर आंदोलन (1918)
गांधीजी ने सत्याग्रह और भूख हड़ताल को दुनिया का सबसे बड़ा अहिंसक हथियार बनाया। गांधीजी ने अहमदाबाद मिल मज़दूरों को प्लेग बोनस और सही सैलरी बढ़ाने के हक के लिए भारत की धरती पर पहली बार साबरमती के किनारे भूख हड़ताल की।
मिल मालिकों का घमंड कुछ ही दिनों में पिघल गया और मज़दूरों को उनके हक मिल गए। गांधीजी ने साबित कर दिया कि बिना खून की एक बूंद बहाए भी सत्ता और पूंजीपतियों को दबाया जा सकता है। 4. सोनम वांगचुक: 21वीं सदी का बर्फीला आंदोलन और लद्दाख की आवाज़
आज जब मॉडर्न ज़माने में सत्याग्रह के मूल्यों को भुलाया जा रहा है, तो लद्दाख के जाने-माने शिक्षाविद और इंजीनियर सोनम वांगचुक एक बार फिर इतिहास दोहरा रहे हैं।
संविधान के 6th शेड्यूल के तहत लद्दाख को सुरक्षा देने की मांग और पर्यावरण को बचाने के लिए उन्होंने माइनस 15 डिग्री तापमान में 15,000 फीट की ऊंचाई पर सिर्फ़ पानी और नमक के सहारे 21 दिनों तक ‘क्लाइमेट फास्ट’ (उपवास) किया। सोनम वांगचुक की इस भूख हड़ताल ने देश और दुनिया का ध्यान लद्दाख की ओर खींचा है और यह साबित किया है कि ज़मीन और पर्यावरण बचाने की लड़ाई अभी भी उपवास के ज़रिए जीती जा सकती है।
‘महानगर मेट्रो ‘ के आखिरी शब्द:
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई शासक या अथॉरिटी अहंकार में अंधा होकर लोगों के अधिकार छीनने की कोशिश करता है, तो सत्याग्रह की भूख हड़ताल पूरे सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। भूख हड़ताल कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि आत्म-शक्ति का एक घातक विस्फोट है जो इतिहास और भूगोल दोनों को बदल देता है!

