सूरत के बहुचर्चित नसीरनगर तोड़फोड़ मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने एक बार फिर राज्य सरकार और सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (SMC) के एडमिनिस्ट्रेशन को कड़ी फटकार लगाई है। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए तीखी टिप्पणी की कि, “राज्य सरकार को हाई कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।” कोर्ट ने सिर्फ़ निचले लेवल के कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर बड़े अधिकारियों को बचाने की पॉलिसी का कड़ा विरोध किया है।
घटना की जानकारी के मुताबिक, सूरत के नसीरनगर इलाके में किए गए गैर-कानूनी या विवादित तोड़फोड़ के काम (‘घोस्ट डिमोलिशन’) को लेकर प्रभावित लोगों ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। जिस तरह से एडमिनिस्ट्रेशन ने बिना सही कानूनी प्रोसेस और नोटिस के तोड़फोड़ की बुलडोज़र कार्रवाई की, उसे लेकर हाई कोर्ट ने शुरू से ही कड़ा रुख अपनाया है। पिछली सुनवाई में, हाई कोर्ट के सख्त रुख के बाद, एडमिनिस्ट्रेशन ने कुछ निचले लेवल के कर्मचारियों और डिप्टी इंजीनियरों के खिलाफ सस्पेंशन समेत कार्रवाई दिखाई थी। हालांकि, आज की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और म्युनिसिपल एडमिनिस्ट्रेशन के इन कदमों को नाकाफी और पक्षपाती बताया। कोर्ट ने तीखे सवाल पूछे और पूछा कि अगर छोटे और निचले लेवल के कर्मचारियों को सस्पेंड किया जा सकता है, तो सूरत के म्युनिसिपल कमिश्नर, जो इतनी बड़ी गड़बड़ियों और गलत कामों के लिए जिम्मेदार हैं, अभी भी अपने पद पर क्यों हैं? म्युनिसिपल कमिश्नर के खिलाफ अभी तक कोई डिसिप्लिनरी या कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
हाई कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि सरकारी सिस्टम कानून से ऊपर नहीं है और नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करके की गई ऐसी मनमानी कार्रवाई को कोर्ट अनदेखा नहीं करेगा। सिस्टम द्वारा पेश किए गए स्पष्टीकरण से बहुत नाखुशी जताते हुए, कोर्ट ने जिम्मेदार सीनियर अधिकारियों की भूमिका पर सफाई मांगते हुए मामले की आगे की सुनवाई टाल दी है। अब पूरे राज्य की नजर है कि अगली सुनवाई में राज्य सरकार और म्युनिसिपल कमिश्नर क्या रुख अपनाते हैं।

