चन्देरी। त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण की अखंड साधना के पर्याय, युगप्रवर्तक राष्ट्रसंत आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का पावन दीक्षा दिवस आज देशभर के जैन मंदिरों, जिनालयों, दयोदय गौशालाओं, गुरुभक्त परिवारों एवं धर्म संस्थाओं में श्रद्धा, भक्ति और विनय के साथ मनाया जाएगा। इस
अवसर पर अभिषेक, पूजन, गुरुवंदना, स्वाध्याय, प्रवचन, सामूहिक जाप तथा गुरु गुणानुवाद के विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
आचार्य श्री का दीक्षा ग्रहण केवल एक व्यक्ति का गृहत्याग नहीं था, बल्कि वह अनादि दिगम्बर श्रमण संस्कृति के पुनर्जागरण का दिव्य उद्घोष था। उन्होंने सांसारिक वैभव, परिवार, मोह, ममता और समस्त परिग्रह का पूर्णतः परित्याग कर आत्मा की शुद्धि, वीतरागता और मोक्षमार्ग की साधना को जीवन का लक्ष्य बनाया। नग्न दिगम्बर मुद्रा में कठोर तप, निरंतर पदविहार, अल्पाहार, अप्रमत्त संयम और अनवरत स्वाध्याय के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि आत्मबल ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
आचार्य श्री ने अपने संपूर्ण जीवन में “जीव दया ही धर्म है” के संदेश को व्यवहार में उतारा। उनके प्रेरणा से देशभर में असंख्य दयोदय गौशालाओं की स्थापना हुई, जहाँ निराश्रित एवं असहाय गौवंश का संरक्षण किया जा रहा है। पक्षियों और मूक प्राणियों के प्रति करुणा जागृत करने के लिए अनेक पक्षी चिकित्सालयों एवं जीवदया केंद्रों की स्थापना हुई। उन्होंने प्रत्येक प्राणी में आत्मा का दर्शन कर अहिंसा को केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार बनाया।
आचार्य श्री ने समाज को स्वदेशी अपनाने का संदेश दिया। वे सदैव कहते थे— “अंग्रेजी नहीं, हिन्दी बोलो; इंडिया नहीं, भारत बोलो।” उनका यह संदेश केवल भाषा परिवर्तन का नहीं, बल्कि आत्मगौरव, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना का आह्वान था। उन्होंने भारतीय संस्कृति, भारतीय शिक्षा, भारतीय जीवन पद्धति तथा आत्मनिर्भरता को राष्ट्र निर्माण का आधार माना।
उनकी प्रेरणा से हथकरघा उद्योग, श्रमदान, ग्रामोदय, स्वावलंबन, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, शिक्षा, संस्कार और गौसंरक्षण जैसे अनेक जनकल्याणकारी अभियान देशभर में विकसित हुए। वे मानते थे कि धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति और अंतिम जीव तक करुणा पहुँचाने का नाम है।
आचार्य श्री का साहित्य भी उनकी तपश्चर्या की भाँति कालजयी है। “मूक माटी” जैसा महाकाव्य मानवता को आत्मचिंतन का संदेश देता है, वहीं “नर्मदा के नरम कंकर” सहित अनेक कृतियाँ अध्यात्म, दर्शन और भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। उनके साहित्य में आत्मानुभूति, करुणा, राष्ट्रभाव और वीतराग दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
धार्मिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अप्रतिम है। उनकी प्रेरणा से कुण्डलपुर में भगवान आदिनाथ की विश्वविख्यात भव्य प्रतिमा और विशाल जैन मंदिर परिसर का निर्माण हुआ। इतना ही नहीं, उन्होंने केवल पत्थरों के तीर्थ नहीं बनाए, बल्कि हजारों युवाओं को संयम मार्ग पर प्रेरित कर अनेक जीवंत तीर्थ समाज को दिए। उनके शिष्यों का तप, त्याग, पदविहार और धर्मप्रभावना आज भी देशभर में आचार्य श्री की दिव्य चर्या को प्रकाशित कर रही है।
आचार्य श्री ने आजीवन हजारों किलोमीटर का पदविहार कर शांति, अहिंसा, अपरिग्रह, आत्मसंयम और वीतरागता का संदेश जन-जन तक पहुँचाया। उनका सम्पूर्ण जीवन जैन दर्शन की उस वाणी का साक्षात् स्वरूप था— “परस्परोपग्रहो जीवानाम्”। उन्होंने सिद्ध किया कि धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि करुणा, संयम और आत्मजागरण का जीवंत आचरण है।
आज उनके पावन दीक्षा दिवस पर सम्पूर्ण जैन समाज श्रद्धापूर्वक उनके श्रीचरणों में विनयांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों—अहिंसा, जीवदया, स्वदेशी, संयम, आत्मशुद्धि और राष्ट्रगौरव—को अपने जीवन में उतारने का संकल्प ले रहा है।

