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थोड़ी देर बाद हम हँसते हैं… वो भी अपने हाल पर! ज़िंदगी की तकलीफ़ों पर हँसना जीने की कला

जब आँसू सूख जाते हैं, तो हँसी पैदा होती है; ‘पाक्को गुजरात’ की कलम से दर्द और मुस्कान के बीच की रहस्यमयी सीमा का सफ़र

ज़िंदगी भी शतरंज का एक अजीब खेल है! कभी दुनिया के मज़ाक पर हँसने का मन करता है, तो कभी किसी और की परेशानियों पर मुस्कुराने का। लेकिन, किसी इंसान की ज़िंदगी का सबसे गहरा, सबसे दुखद और सबसे मज़बूत पल वह होता है जब वह अपनी बर्बादी, अपनी किस्मत और अपने हालात पर दिल खोलकर हँसता है। एक गुमनाम हिंदी कवि ने इस हमेशा रहने वाले सच को सिर्फ़ दो लाइनों में बहुत अच्छे से पिरोया है: “थोड़ी देर बाद हम अपनी बदकिस्मती पर हँसते हैं… वो भी अपने हाल पर।” आज ‘पाक्को गुजरात’ के इस खास आर्टिकल में, आइए इन दो लाइनों के पीछे छिपे ज़िंदगी के बहुत गंभीर फ़लसफ़े को समझने की कोशिश करते हैं। जब दर्द खत्म होता है, तो हंसी आती है:

साइकोलॉजी कहती है कि इंसान तभी तक रोता है जब तक उसे उम्मीद रहती है कि कोई उसके आंसू देखकर उसे मनाने आएगा या हालात बदल जाएंगे। लेकिन जब मुश्किलों का पहाड़ इतना बड़ा हो जाता है कि रोने का कोई मतलब नहीं बचता, तो अंदर का सारा डर गायब हो जाता है। जब सालों से जमा हुआ दुख आंसू बनकर नहीं बह पाता, तो वह हंसी बनकर बाहर आता है। अपने हालात पर हंसना पागलपन नहीं, बल्कि इस दुनिया के भ्रम और अपनी उम्मीदों पर एक ज़ोरदार चोट है।

उम्मीदें तोड़ना और सच को मानना:

हम ज़िंदगी में कितनी प्लानिंग करते हैं! ‘मैं यह करूंगा, मैं वह करूंगा, मैं दुनिया जीत लूंगा…’ लेकिन समय का एक ही झटका हमारे सारे महल ताश के पत्तों की तरह बिखेर देता है। जब इंसान खुद को बेबस देखता है, अपनी गलतियों की लंबी लिस्ट देखता है और किस्मत का खेल समझता है, तो उसे एहसास होता है कि जिसे वह इतनी गंभीरता से ले रहा था, वह तो बस एक नाटक था। इस सच को समझते ही उसके चेहरे पर जो मुस्कान आती है, वह आज़ादी की मुस्कान होती है। वो मुस्कान कहती है: “वाह, ज़िंदगी! इसने मेरा भी कितना मज़ाक बना दिया!”

ये मुस्कान हार नहीं, एक नई शुरुआत की निशानी है:

जब कोई इंसान अपने अभी के हालात पर हंस सकता है, तो समझ लो कि अब दुनिया की कोई भी ताकत उसे हरा या तोड़ नहीं सकती। क्योंकि जिस इंसान ने खुद पर हंसना सीख लिया, उसका ईगो खत्म हो गया है। इस हालत में पहुंचकर हंसना दिखाता है कि अब दिल हल्का हो गया है। अब न बीते हुए कल का कोई अफसोस है और न आने वाले कल की कोई चिंता।

मैसेज:

कभी-कभी ज़िंदगी के सफर में ऐसा मोड़ आता है जब सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है, तो कोने में बैठकर रोने के बजाय, शीशे के सामने खड़े होकर खुद पर ज़ोर से हंसो। वो मुस्कान तुम्हें लड़ने की नई ताकत देगी। ज़िंदगी तुम पर कितने भी पत्थर फेंके, अगर तुम अपने अभी के हालात पर हंसने की हिम्मत रखते हो, तो खुशियां भी एक दिन शर्माते हुए तुम्हारे पास लौट आएंगी।

ज़िंदगी के ऐसे ही अनोखे रंग और सही ख्याल पढ़ने के लिए ‘पाको गुजरात’ से जुड़े रहो।

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