लखनऊ पुलिस ने साइबर अपराधियों के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। यह रैकेट विदेशियों को निशाना बनाता था। पुलिस ने इस मामले में 119 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस रैकेट के तार संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क से जुड़े हैं।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गई है। लखनऊ पुलिस ने शहर के गोमती नगर की समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल से चल रहे एक रैकेट का भंडाफोड़ किया है। जांच करने वाले अधिकारियों ने इसे ‘मिनी जामताड़ा’ कहा है। ऑइस मामले में पुलिस ने 119 लोगों को हिरासत में लिया है। यह सभी कथित तौर पर अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाने वाले एक बहुत ही संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क से जुड़े थे।
पुलिस ने बताया कि यह रैकेट सोलारिस सॉल्यूशन नाम के एक फर्जी कॉल सेंटर से चलाया जा रहा था। यह रैकेट कामर्शियल कॉम्प्लेक्स में स्थित दो ऑफिसों में करीब 18 महीनों से काम कर रहा था। साइबर अपराध रैकेट के खिलाफ कार्रवाई डीसीपी (क्राइम) अनिल यादव और एडिशनल डीसीपी (क्राइम) किरण यादव के नेतृत्व में पुलिस की टीम ने की।
पुलिस ने समिट बिल्डिंग में छापा मारा
इस रैकेट के बारे में जानकारी मिलने पर पुलिस ने समिट बिल्डिंग में छापा मारा। पुलिस ने पाया कि वहां एक अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर चल रहा है। इसमें आधुनिक कम्युनिकेशन सिस्टम, कई वर्कस्टेशन और कॉलिंग के लिए खास टीमें काम कर रही थीं। ऑपरेशन के दौरान 119 कर्मचारियों और सहयोगियों को हिरासत में लिया गया। जांचकर्ताओं ने 100 लैपटॉप, 178 मोबाइल फोन, स्टोरेज डिवाइस और बहुत सारे डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए। यह सामान फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है।
अमेरिकी बोलचाल के लहजे की ट्रेनिंग
पुलिस के अनुसार साइबर अपराधियों का यह सिंडिकेट कथित तौर पर राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कई पूर्वोत्तर राज्यों से अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं को 30 -35 हजार रुपये की मासिक सैलरी पर भर्ती करता था। भर्ती किए गए लोगों को काम पर लगाने से पहले अमेरिकी लहजे, पहले से तय बातचीत और मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने की तकनीकों की ट्रेनिंग दी जाती थी।
निशाने पर अमेरिकी नागरिक
जांच अधिकारियों के अनुसार, यह रैकेट मुख्य रूप से कानूनी एजेंसियों, बैंकों और टेक्नोलॉजी कंपनियों के अधिकारियों के रूप में खुद को पेश करके अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाता था। शिकार बनाए जाने वाले लोगों को कथित तौर पर बताया जाता था कि मनी लॉन्ड्रिंग, पहचान छुपाने या वित्तीय धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों के लिए उनकी जांच चल रही है और उन्हें डिजिटल अरेस्ट किया गया है। यह साइबर धोखाधड़ी की एक तकनीक है जिसमें पीड़ितों को लगातार वीडियो या वॉयस कॉल पर रखा जाता है और उन्हें झूठा यकीन दिलाया जाता है कि वे आधिकारिक निगरानी में हैं और उन्हें किसी और से संपर्क करने की इजाजत नहीं है।
सबूत छोड़ने से बचने के कई तरीके
पुलिस ने बताया कि इसके बाद पीड़ितों पर वेरिफिकेशन के लिए कथित तौर पर सुरक्षित या सरकार की ओर से अधिकृत खातों में पैसे ट्रांसफर करने का दबाव डाला जाता था। जांच से बचने के लिए पैसे को कथित तौर पर डिजिटल वॉलेट के जरिए भेजा जाता था या सोने में बदल दिया जाता था। कुछ मामलों में पीड़ितों को रिमोट-एक्सेस एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए मनाया गया। ऐसा करके धोखाधड़ी करने वाले उनके डिवाइस, बैंकिंग क्रेडेंशियल, कार्ड की जानकारी और वन टाइम पासवर्ड (OTP) हासिल करने में सफल हो गए।
रात में सक्रिय होता था कॉल सेंटर
जांचकर्ताओं ने बताया कि पीड़ितों को बहला-फुसलाकर ट्रांजैक्शन को मंजूरी देने या संवेदनशील वित्तीय जानकारी बताने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। यह कॉल सेंटर भारत में ज्यादातर रात में काम करता था ताकि अमेरिका में दिन के कामकाजी समय के साथ तालमेल बिठाया जा सके। पुलिस ने गोमती नगर एक्सटेंशन में रहने वाले ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार की पहचान इस नेटवर्क के कथित ऑपरेशनल मैनेजर के तौर पर की है।

